गुरुगीता-20

सय्यद अब्दुल्ला शाह क़ादरी (शाहमुखी/गुरुमुखी) जिन्हें  बुल्ले शाह के नाम से भी जाना जाता है एक पंजाबी दार्शनिक एवं संत थे। उनके पहले आध्यात्मिक गुरु संत सूफी मुर्शिद शाह इनायत अली थे, वे लाहौर से थे। बुल्ले शाह को मुर्शिद से आध्यामिक ज्ञान रूपी खज़ाने की प्राप्ति हुई और उन्हें उनकी करिश्माई ताकतों के कारण पहचाना जाता था।बुल्ले शाह का मूल नाम अब्दुल्लाशाह था| आगे चलकर इनका नाम बुल्ला शाह या बुल्ले शाह हो गया| प्यार से इन्हें साईं बुल्ले शाह या बुल्ला कहते । इनके जीवन से सम्बन्धित विद्वानों में अलग-२ मतभेद है| इनका जन्म 1680 में उच गीलानियो में हुआ|
इनके पिता मस्जिद के मौलवी थे| वे सैयद जाति से सम्बन्ध रखते थे| पिता के नेक जीवन के कारण उन्हें दरवेश कहकर आदर दिया जाता था| पिता के ऐसे व्यक्तित्व का प्रभाव बुल्ले शाह पर भी पड़ा| इनकी उच्च शिक्षा कसूर में ही हुई| इनके उस्ताद हजरत गुलाम मुर्तजा सरीखे ख्यातनामा थे| अरबी, फारसी के विद्वान होने के साथ साथ आपने इस्लामी और सूफी धर्म ग्रंथो का भी गहरा अध्ययन किया|
परमात्मा की दर्शन की तड़प इन्हें फकीर हजरत शाह कादरी के द्वार पर खींच लाई| हजरत इनायत शाह का डेरा लाहौर में था| वे जाति से अराई थे| अराई लोग खेती-बाड़ी, बागबानी और साग-सब्जी की खेती करते थे| बुल्ले शाह के परिवार वाले इस बात से दुखी थे कि बुल्ले शाह ने निम्न जाति के इनायत शाह को अपना गुरु बनाया है| उन्होंने समझाने का बहुत यत्न किया परन्तु बुल्ले शाह जी अपने निर्णय से टस से मस न हुए ।। उन्होंने शुरुआती शिक्षा अपने पिता से ग्रहण की थी और उच्च शिक्षा क़सूर में ख़्वाजा ग़ुलाम मुर्तज़ा से ली थी। पंजाबी कवि वारिस शाह ने भी ख़्वाजा ग़ुलाम मुर्तज़ा से ही शिक्षा ली थी उनके सूफ़ी गुरु इनायतशाह थे। बुल्ले शाह की मृत्यु 1757 से 1759 के बीच क़सूर में हुई थी। बुल्ले शाह के बहुत से परिवार जनों नेउनका शाह इनायत का चेला बनने का विरोध किया था क्योंकि बुल्ले शाह का परिवार पैग़म्बर मुहम्मद का वंशज होने की वजह से ऊँची सैय्यद जात का था जबकि शाह इनायत जात से आराइन थे, जिन्हें निचलीजात माना जाता था लेकिन बुल्ले शाह इस विरोध केबावजूद शाह इनायत से जुड़े रहे ।
सैकड़ों वर्ष बीतने के बाद भी बाबा बुल्ले शाह कीरचनाएँ अमर बनी हुई हैं। आधुनिक समय के कईकलाकारों ने कई आधुनिक रूपों में भी उनकीरचनाओं को प्रस्तुत किया है, जिनमें से कुछ हैं:
बुल्ले शाह की कविता "बुल्ला की जाना" को रब्बीशेरगिल ने एक रॉक गाने के तौर पर गाया।
इनकी कविता का प्रयोग पाकिस्तानी फ़िल्म "ख़ुदा केलिये" के गाने "बन्दया हो" में किया गया था।
इनकी कविता का प्रयोग बॉलीवुड फ़िल्म रॉकस्टार केगाने "कतया करूँ" में किया गया था।
फ़िल्म दिल से के गाने "छइयाँ छइयाँ" के बोल इनकीकाफ़ी "तेरे इश्क नचाया कर थैया थैया" पर आधारितथे।
बुल्ले शाह धार्मिक प्रवत्ति के थे। उन्होंनेसूफी धर्म ग्रंथों का भी गहरा अध्ययन किया था।साधना से बुल्ले ने इतनी ताकत हासिल कर ली किअधपके फलों को पेड़ से बिना छुए गिरा दे। पर बुल्ले को तलाश थी इक ऐसे मुर्शिद की जो उसे खुदा से मिला दे। उस दिन शाह इनायत अराईं (छोटी मुसलिमजात) के बाग के पास से गुज़रते हुए, बुल्ले की नज़र उन पर पड़ी। उसे लगा शायद मुरशद की तलाश पूरी हुई। मुरशद को आज़माने के लिए बुल्ले ने अपनी गैबीताकत से आम गिरा दिए। शाह इनायत ने कहा, नौजवान तुमने चोरी की है। बुल्ले ने चतुराई दिखाई, ना छुआ, ना पत्थर मारा, कैसी चोरी? शाह इनायत ने इनायत भरी नजऱों से देखा, हर सवाल लाजवाब होगया। बुल्ला पैरों पर नतमस्तक हो गया। झोली फैला खैर मांगी मुर्शिद! मुझे खुदा से मिला दे। मुर्शिद  ने कहा, मुश्किल नहीं है, बस खुद को भुला दे। फिर क्या था ? बुल्ला मुर्शिद का मुरीद हो गया। लेकिन अभी इम्तिहान बाकी थे। पहला इम्तिहान तो घर से ही शुरू हुआ। सैय्यदों का बेटा अराईं का मुरीद हो, तो तथाकथित समाज   में मौलाना की इज्ज़त खाक में मिल जाएगी पर बुल्ला कहां जाति को जानता है।कहां पहचानता  है समाज के मजहबों वाले मुखौटे।परिवारीजनों द्वारा उन्हें समझाने का बहुत यत्न कियापरन्तु बुल्ले शाह जी अपने निर्णय से टस से मस न हुए। परिवारीजनों के साथ हुई तकरार का ज़िक्र उन्होंनेअपनी कविताओं में भी किया है। उनकी बहनें-भाभीयां जब समझाती हैं-
    बुल्ले नू समझावण आइयां भैणां ते भरजाइयां
    बुल्ले तूं की लीकां लाइयां छड्ड दे पल्ला अराइयां
आख़िर शिष्य ने ख़ुद को भुलाकर गुरु में ही ख़ुद को मिला दिया।

गुरुगीता
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दीर्घदण्डं नमस्कृत्य निर्लज्जो गुरुसन्निधौ ।
आत्मदारादिकं सर्वं गुरवे च निवेदयेत् ।। 22 ।।
अर्थ
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गुरु के सानिध्य में निर्लज्ज होकर दण्डवत प्रणामपूर्वक अपने आपको और अपनी स्त्री,पुत्र आदि सबको गुरु को निवेदन कर देना चाहिए।समस्त भार उनके श्री चरण में
समर्पित करके निश्चित हो । जीव की अहंता, ममता का भार बड़ा विषम भार है, यह भार ग्रहण करने में एक मात्र
गुरु ही समर्थ है। उनके चरणकमलों में "मैं- मैं - मेरा-मेरा"
यह अहंता, ममता निवेदन करें ।अनन्तर उनका प्रसाद स्वरूप "मैं-मेरा" लेकर व्यवहार करे। अर्थात् श्री गुरुदेव ही सब कर्मों के प्रेरक हैं, यह निश्चित रूप से जानकर "गुरु-गुरु" जप करते-करते कर्म-क्षय हो जायेगा ।।22।।

22. In the presence of the Master the disciple should prostrate himself without any hesitation and offer his regards and respects and also present his wife and kids etc. to the Master.
COMMENTS:
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  The disciple should surrender all responsibilities to the Master and become carefree. The individual Jeeva) carries a great load of his own ego and of his attachment towards worldly relations. The Master only, is capable of bearing this responsibility. The sentiments of 'I' and this is 'mine' and attachment should be offered unto the lotus feet of the Master. Later on this should be accepted as his prasad' and then carry on the world relationship. It means the Master is the inspirator of all the activities and once this is realized in a definitive way the disciple will be liberated from the bondage of Karma by the Japa of the word "Guru-Guru".
                                      👣🙏

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