अमृतवाणी-124/125/126

शंकर भगवान के गले में पड़े हुए हैं काले सॉप और मुण्डों की माला । काले विषधरों का इस्तेमाल इस तरीके से किया है, उन्होंने कि उनके लिए ये फायदेमंद हो गये और काटने भी नहीं पाये । शंकर जी की इस शिक्षा को हर शंकर-भक्त को अपनी फिलॉसफी में सम्मिलित करना ही चाहिए कि विषैले लोगों से किस तरीके से उन्हें गले से लगाना चाहिए और किस तरीके से उनसे फ़ायदा उठाना चाहिए  ? शंकर जी के गले पर पड़ी मुंडों की माला भी यह कह रही है कि जिस चेहरे को हम बीस बार शीशे में देखते हैं सजाने-संवारने के लिए रंग-पाउडर पोतते हैं, वह मुंडों की हड्डियों का टुकड़ा मात्र है ।चमड़ी, जिसे ऊपर से सुनहरी चीज़ों से र॔ग दिया गया है और जिस बाहरी टुकड़े के रंग को हम देखते हैं, उसे उघाड़ कर देखें तो मिलेगा कि इनसान की जो ख़ूबसूरती है, उसके पीछे सिर्फ हड्डी का टुकड़ा जमा हुआ पड़ा है ।हड्डियों की मुंडमाला की यह शिक्षा है, जो हमको शंकर भगवान के चरणों में बैठकर सीखनी चाहिए ।

                                 परमपूज्य गुरुदेव
                        (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

हेमाद्रि संकल्प किसे कहते हैं  ? चिन्तन और कॄत्य जो हम शरीर से करते हैं । आदमी का चिन्तन-बीज है और कृत्य उसका फल । विचार भी एक काम है, उसका परिणाम भी होता है । ग॔दे विचार करते रहिये फिर देखिये आपका पतन कैसे होता है, दिमाग कैसे खराब होता है । हेमाद्रि संकल्प इस बात को बताता है कि हमारे जीवन में जो निषेधात्मक पक्ष है-उसको ठीक करें,धोयें, लोहा लें, लड़ें बराबर अपने आपसे। लड़ाई में कमजोरी को जाहिर कर दिया तो आपके ऊपर आसुरी शक्तियॉ हावी हो जायेंगी ।इसलिए हर समय आपको चौकीदारी करनी चाहिए । जिस दिन पहरा बन्द कर देंगे, उसी दिन आपके घर का सफाया हो जायेगा, चोर माल उठा ले जायेंगे ।
सुरक्षा के लिए क्या करना पड़ता है  ? इसके लिए दो सूत्र हैं एक-लड़कियां अपने भाई के हाथ में राखी बॉधती हैं । बहिन राखी लेकर आई और आपने उसे पॉच रुपये, एक धोती या दुपट्टा दे दिया और हो गया कार्य खत्म ।अरे  ! भाईसाहब, इसके लिए नहीं आती बहिन । भिखारिन नहीं है जो आपसे कुछ मॉगने आयेगी । किसलिए आई थी  ? ये प्रतीकों का त्यौहार है ।लड़कियां गा रही थीं-"मेरी राखी"।मेरी से मतलब है कि नारी समाज कोई व्यक्ति विशेष नहीं ।कोई लड़की प्रतिनिधित्व करती है-सारे नारी समाज का ।किसी का राष्ट्रीय, पारिवारिक और सामाजिक जीवन सुरक्षित बन सके, इसके लिए दो अपेक्षाएं हैं।दो की रक्षा ।काहे की रक्षा होनी चाहिए  ? एक रक्षा नारी के सम्मान की होनी चाहिये । नारी का सम्मान-शील भी उसी में आता है ।नारी को दूसरे दर्जे का नागरिक, जैसा कि आज है, नहीं बनना चाहिये ।उसको बलिष्ठ रहना चाहिए ।नर के द्वारा प्रत्येक क्षेत्र में उसका सम्मान होना चाहिए । इसके लिए ये रक्षा-सूत्र नारी की ओर से बॉधा जाता है ।उसका सम्मान, उसकी इज्जत, उसका गौरव हर जगह होना चाहिए ।

                               परमपूज्य गुरुदेव
                      (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

नर और नारी दोनों इनसान हैं।दोनों को एक-दूसरे की इज्जत करनी चाहिए।विचारों का विनिमय, मतभेदों का जहाँ तक ताल्लुक है आप बातचीत कीजिए, समझौता कीजिए, लेकिन सम्मान पर किसी के ऑच मत आने दीजिये।न मर्दों की ओर से नारी के सम्मान पर ऑच आनी चाहिए, न नारी की ओर से मर्द के सम्मान पर ऑच 
आनी चाहिए। नारियॉ मर्द के सम्मान पर ठेस नहीं पहुँचाती, पर अक्सर मर्द की ओर से नारी के सम्मान पर ठेस पहुँचाई जाती है।ये नहीं होना चाहिए।नारी के सम्मान की रक्षा, सामाजिक सुरक्षा के लिए सूत्र है। जहाँ नारी सम्मान पायेगी, विकसित होगी, वहॉ उसका अंतरंग विकसित होगा।जहाँ आपने उसके सम्मान में कमी करना शुरू किया, वह नारी के लिए न जाने क्या से क्या हो जायेगा और उसकी अंतरात्मा, उसका गौरव गिरता हुआ चला जायेगा।एक और कारण भी है कि आर्थिक दृष्टि से नारी का कमजोर होना उसके लिए कितना अभिशाप हो जाता है  ? आपकी कमाई और आपकी बुद्धि का एक हिस्सा इस काम के लिए लगना चाहिए।नारी ने पुकार की है कि हमारी आर्थिक कमजोरी का अनुचित लाभ न उठाने दिया जाए।सारे समाज का कर्तव्य है कि जब नारी से सारा लाभ उठाता है-माता, पत्नी, बेटी और बहिन के रूप में, तो उसका टैक्स भी चुकाना चाहिये।नारी का आर्थिक स्वावलम्बन कमजोर पड़ता है, तो उसकी मदद करें-ये रक्षा-सूत्र की प्रेरणा है ।

                                   परमपूज्य गुरुदेव
                           (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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