अमृतवाणी-130/131/132
अमृतवाणी
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शंकर भगवान की तीन ऑखें हैं।दो ऑखें तो सबके होतीं हैं,पर शंकर जी की तीन ऑखें क्यों बनाई गईं ? शंकर भगवान की यह वह ऑख है, जो मनुष्य के विवेक की ऑख कहलाती है।ये तीसरी ऑख आपके भी होती है।उन्होंने इसका इस्तेमाल तब किया जब कामदेव उन्हें हैरान करने और पाप में डुबाने के लिए चला आ रहा था।जैसे ही शंकर भगवान ने तीसरी ऑख खोली, कामदेव जलकर भस्म हो गया।रामायण में यह कथा आप लोगों ने पढ़ी होगी पर यह गौर क्यों नहीं किया कि तीसरी ऑख क्या है ? कामदेव जलने की बात क्या है ? जिन लोगों ने साइंस पढ़ी है वे 'थ्री डायमेंसन' की बात समझते हैं-लंबाई ,चौड़ाई और गहराई की बात जानते हैं ।तीसरी ऑख हमें गहराई में घुसने की बात सिखाती है ।गहराई में हम घुसते नहीं, बाहर की चीजें देखते हैं । हमें दो चीजें दिखाई देती हैं-सुख और दुःख, लाभ और हानि।यही दो चीजें हैं जो दोनों ऑखें दिखा सकतीं हैं।ये दुनियाबी ऑखें हैं जो भगवान ने आपको दी हैं। शरीर क्या मॉगता है ? इन्द्रियॉ क्या मॉगती हैं ? यह हम सबको मालूम है।एक और ऑख भी है जो खुशहाली की बात दिखाती है।शंकर के हर एक भक्त को भी एक तीसरी ऑख रखनी चाहिये और खोलनी चाहिए और वह है दूरगामी विवेकशीलता।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
शंकर का भक्त जब अपने भगवान के चरणों में जाता है, तब वह देखता है कि उस ठप्पे पर मुझको भी अपने को ढालना चाहिए।शंकर भगवान क्या हैं-एक ठप्पा।ठप्पा उसे कहते हैं, जिसमें गीली मिट्टी को चिपकाकर कुम्हार बर्तन बनाता चला जाता है।शंकर भगवान के लिए पूजा और आरती ही काफ़ी नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि उनका भक्त उनके जैसा हो जाए।उपासना का मतलब ही होता है,पास बैठना।पास बैठने का मतलब है-उनसे सीखना, उनके साथ संबंध जोड़ना।लकड़ी जब तक आग के समीप नहीं बैठती,अग्नि नहीं बन सकती।हमको शंकर भगवान के पास तक जाना पड़ेगा, दूर रहकर ही प्रणाम करने से काम चलने वाला नहीं है।शंकर जी से चिपक जाना चाहिए और अपने आपको ठप्पा बना लेना चाहिए।हमको अपनी तीसरी ऑख खोलनी चाहिए और दूर की बात सोचनी चाहिए।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
मित्रों !
जानवर की एक विशेषता यह होती है कि उसे अपने पेट की हमेशा फ़िक्र बनी रहती है।जब वह जवान होता है तो उसे सन्तान पैदा करने का ख़्याल आता है। दो के अलावा वह और कोई काम कर नहीं पाता और इनसान ? इनसान देखने में तो जानवरों जैसा ही मालूम होता है, किन्तु उसमें भावनायें पाई जाती हैं।वनमानुष,बन्दर,लंगूर शायद आपने देखे हों,इनसे मिलती-जुलती है आदमी की देह।लेकिन उसकी विशेषता खासतौर से यह है कि उसमें भावनायें होतीं हैं।कहीं अकाल पड़ता है तो आदमी अपने अनाज के कोठों को खाली कर देता है।कहता है कि हम अकेले जीकर के क्या करेंगे ? बाक़ी लोग भी खायें तो क्या हर्ज़ है ? यदि किसी के छप्पर में, मुहल्ले में आग लगे तो वह सबसे पहले दौड़ता है आग बुझाने के लिए ।यह क्या है ? यह है आदमी की भावनायें। दूसरों की सेवा के लिए दौड़ पड़ना, यह इंसानियत की एक ही परीक्षा है।अगर इस परीक्षा में फ़ेल हो जायें तो जानना चाहिये कि शक़्ल इनसान जैसी भले हो,पर है तो वास्तव में जानवर।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
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