अमृतवाणी-158/159/160
(श्राद्ध विशेष)
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लन्दन की एक महिला रोजमेरी ब्राउन परलोक वेत्ताओं के लिए पिछली तीन दशाब्दियों से आकर्षण का केन्द्र रही है। वे संगीत में पारंगत हैं। बहुत शर्मीले स्वभाव की हैं भीड़-भाड़ से, सार्वजनिक आयोजनों से दूर रहती हैं और अपनी एकान्त साधना को शब्द ब्रह्म की साधना के रूप में करती है।
आश्चर्य यह है कि उनका कोई मनुष्य संगीत शिक्षक कभी नहीं रहा। उन्हें इस शिक्षा में अदृश्य मनुष्य सहायता देते रहे हैं और उन्हीं के सहारे वे दिन दिन प्रगति करती चली है। उनकी संगीत साधना तब शुरू हुई जब वे सात साल की थीं। उन्होंने एक सफेद बालों वाला—काले कोट वाला आत्मा देखा जो आकाश से ही उतरा और उसी में गायब हो गया। उसने कहा मैं संगीतज्ञ हूं तुझे संगीतकार बनाऊंगा। कई वर्ष बाद उसने विख्यात पियानो वादक स्वर्गीय फ्रांजलिस्ट का चित्र देखा वह बिलकुल वही था जो उसने आकाश में उतरते और उसे आश्वासन देते हुए देखा था।
बचपन में वह कुछ थोड़ा-सा ही संगीत सीख सकीं। पीछे वह विवाह के फेर में पड़ गईं और जल्दी ही विधवा भी हो गईं। उन दिनों उसकी गरीबी और परेशानी भी बहुत थीं, फिर वही मृतात्मा आई और कहा संगीत साधना का यही उपयुक्त अवसर है। उसने कबाड़ी के यहां से एक टूटा पियानो खरीदा और बिना किसी शिक्षक के संगीत साधना आरम्भ करदी। रोजमेरी ब्राउन का कहना है कि उसका अशरीरी अध्यापक अन्य संगीत विज्ञानियों को साथ लेकर उसे सिखाने आता है। उनके मृतात्मा शिक्षकों में वाख, बीठो, फेंन, शोर्य, देवुसी, लिश्ट, शूवर्ट जैसे महान् संगीतकार सम्मिलित हैं जो उसे ध्वनियां और तर्ज ही नहीं सिखाते उसका उंगलियां पकड़ कर यह भी बताते हैं कि किस प्रकार बजाने से क्या स्वर निकलेगा। गायन की शिक्षा में भी वे अपने साथ गाने को कहते हैं। वे यह सब प्रत्यक्ष देखती हैं पर दूसरे पास बैठे हुए लोगों को ऐसा कुछ नहीं दीखता। रोजमेरी ने एक जीवित शिक्षक को परीक्षक के रूप में रखा है। यह सिर्फ देखता रहता है कि उसके प्रयोग ठीक चल रहे हैं या नहीं। ऐसा वह इसलिए करती है कि कहीं उसकी अन्तःचेतना झुठला तो नहीं रही है। उसके अभ्यास सही हैं या गलत। पर वह दर्शक मात्र अध्यापक उसके प्रयोगों को शत प्रतिशत सही पाता है। रोजमेरी लगभग 400 प्रकार की ध्वनियां बजा लेती है। बिना शिक्षक के टूटे पियानो पर बिना निज की उत्कट इच्छा के यह क्रम इतना आगे कैसे बढ़ गया, इस प्रश्न पर विचार करते हुए अविश्वासियों को भी यह स्वीकार करना पड़ता है कि इस महिला के प्रयासों के पीछे निस्सन्देह कोई अमानवीय शक्तियां सहायता करती हैं।
रोजमेरी का जीवन गरीबी और कठिनाइयों से भरा था। वह एक स्कूल में रसोईदारिन का काम करती थी, उसी में से उसने समय निकाला और अपने अदृश्य सहायकों की सहायता से संगीत साधना का क्रम चलाया। लोगों ने उसके कथन में यथार्थता पाई तो उन्होंने स्वर्गीय आत्माओं द्वारा निर्देशित कुछ संगीत निर्देशावलियां नोट कराने का अनुरोध किया। उसने यह स्वीकार कर लिया। फलतः 3000 शब्दों की एक संगीत निर्देश माला प्रकाशित हुई। नाम है उसका टेन कमांडमेन्टर फरन्युजिशि येशन्स। इन निर्देशों के आधार पर जो ग्रामोफोन रिकार्ड (एल.पी.) बने हैं उन स्वर्गीय आत्माओं के संगीत से परिचित लोगों को इस सादृश्य से बहुत प्रभावित किया है। मनोविज्ञान शास्त्र के सुप्रसिद्ध शोधकर्ता री मारिस वार्व नेल की मान्यता है कि रोजमेरी को अतीन्द्रिय श्रवण और दर्शन की विलक्षण शक्ति प्राप्त है और वह उसी के सहारे प्रगति कर रही हैं।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
(श्राद्ध विशेष)
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एक तो युद्ध स्थल उस पर घनघोर अंधेरी रात और भयानक शीत ऐसा लगता था वीभत्सता साकार होकर व्याप्त हो गई हो। एक तम्बू के अन्दर कुछ सैनिक कोयले की अंगीठी जलाये बैठे आंच ले रहे हैं। उनका वायरलेस सेट पास ही रखा है। युद्ध अभी खामोश है इसलिये सब अपने-अपने घरों की याद कर रहे हैं ऐसी ही चर्चा में वे सब संलग्न हैं तभी वायरलेस पर कमाण्डर का हुक्म आता है अपनी उत्तर वाली चौकी की सहायता के लिए तुरन्त प्रस्थान करो।
घटना जम्मू-काश्मीर की है सन् 1961 जब भारत का पाकिस्तान से युद्ध हुआ। यह सभी जवान जिस स्थान पर बैठे हैं चौकी वहां से 15 मील दूर है। सवेरा होने से पहले ही वहां पहुंचता है सवेरा हो जाने पर दुश्मन देख सकता था मार सकता था अतएव कैसी भी कठिनाइयों में सवेरा होने तक चौकी पहुंचना आवश्यक था। अतएव वहां से उसी प्रकार तत्परता पूर्वक आगे बढ़े जिस तरह मृत्यु को कभी न भूलने वाले योगी मनुष्य जीवन को अस्त-व्यस्त तरीके से नहीं व्यवस्थित अनुशासन पूर्वक और तत्परता से जीते हैं।
13 नवम्बर की बात है। ठण्डक के दिन थे। 10 सिपाहियों की छोटी-सी टुकड़ी अपने अस्त्र संभाले नक्शे के सहारे आगे बढ़ रही थी। वायरलेस से कमाण्ड-पोस्ट का सम्पर्क बना हुआ। सम्वादों का आदान-प्रदान भी ठीक-ठीक चल रहा था कि एकाएक ऐसा स्थान आ पहुंचा जहां से आगे बढ़ना नितान्त कठिन हो गया। सारा स्थान बर्फ से ढक गया था। युद्ध में सैनिक नक्शों में नदी नाले टीले, वृक्ष आदि संकेतों के सहारे बढ़ते हैं पर बर्फ ने पृथ्वी के सभी निशान मिटा डाले थे। नदी—झरने सब जम चुके थे। पेड़-पौधे तक बर्फ से ढके थे ऐसी स्थिति में आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। सभी सैनिक निस्तब्ध खड़े रह गये सोच नहीं पा रहे थे क्या किया जाये?
कहते हैं युद्ध के समय अदृश्य आत्माओं की भावनाओं की सम्वेदनशीलता बढ़ जाती है। द्वितीय महायुद्ध के दौरान अतीन्द्रिय अनुभूतियों, मृतात्माओं के विलक्षण क्रिया-व्यापार सम्बन्धी सैकड़ों घटनाओं के प्रामाणिक विवरण सैनिक रिकार्ड्स में पाये जाते हैं। यह घटना भी उसी तरह की है और प्रकाश डालती है कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का चेतन शरीर का नाश नहीं होता। यदि आत्मा तुरन्त मृत्योपरान्त नींद में नहीं चली जाती और उसकी कोई प्रबल कामना भी नहीं होती तो वह सांसारिक कर्तव्यों में जीवित व्यक्तियों को जीवित व्यक्तियों भांति ही सहायता पहुंचा सकती है। यह घटना उस तथ्य की पुष्टि में ही दी जा रही है। इस टुकड़ी में जो दस सैनिक थे उन्हीं में से एक श्री गिरजानन्द झा—मस्ताना के द्वारा प्रस्तुत यह घटना 1962 के एक धर्म-युग अंक में भी छपी थी।
अभी सैनिक इस चिन्ता में ही थे कि अब किस दिशा में कैसे बढ़ा जाये कि किसी की पद-ध्वनि सुनाई दी। अब तक आकाश में चन्द्रमा निकल आया। आशंका से भरे सैनिकों ने देखा सामने एक ऑफिसर खड़ा है। कन्धे पर दो स्टार देखने से लगता था वह लेफ्टिनेंट हैं। देखते ही सैनिकों ने उन्हें सैल्यूट किया। सैल्यूट का उत्तर सैल्यूट से ही देकर लेफ्टिनेंट साहब बोले—देखो आगे का रास्ता भयानक है तुम लोगों को कुछ मालुम नहीं है। चौकी दूर है सवेरा होने में कुल चार घन्टे बाकी हैं इसलिये बिना देर किये तुम लोग मेरे पीछे-पीछे चले आओ। यह कहकर वे पीछे मुड़े—सैनिकों ने देखा लेफ्टिनेंट साहब की कमीज में पीठ पर गोल निशान है लगता था उतना अंश जल गया था। बिना किसी नक्शे के सहारे लेफ्टिनेंट साहब आगे-आगे ऐसे बढ़ते जाते थे मानो वह सारा क्षेत्र उनका अच्छी तरह घूमा हुआ हो। सिपाही परेशान भी थे और चिन्तित भी कि यह अजनबी ऑफिसर इस इलाके के इतने माहिर क्यों हैं। कभी-कभी आशंका भी हो जाती थी कि कहीं कोई दुर्घटना तो होने वाली नहीं है। चुपचाप चलने में खामोशी और उदासी सी अनुभव हो रही थी। उस उदासी को दूर करते हुए कमाण्डर ने बताया मेरी पीठ पर यह निशान जो तुम लोग देख रहे हो वह कल की गोलाबारी का है—हम लोग हमले की तैयारी में थे तभी पाकिस्तानी सेना ने गोलाबारी शुरू कर दी। सब लोग जमीन पर लेट गये, तभी एक बम आकर उधर फटा। उसी का एक टुकड़ा मेरी पीठ पर गिरा कमीज जल गई......। इससे आगे कुछ और कहने से पूर्व उन्होंने बातचीत का रुख मोड़कर कहा—तुम लोग शायद आत्मा की अमरता पर विश्वास न करते हो पर मैं करता हूं मरने के बाद आत्मायें अपने जीवन विकास की तैयारी करती हैं, जिसकी जो इच्छायें होती हैं उसी तरह के जीवन की तैयारी में वे जुट जाती हैं कोई इच्छा न होने पर भगवान् अपनी ओर से प्रेरित करके उसे आगे के क्रम में नियोजित करते हैं।
बात-चीत करते-करते रास्ता कट गया और रात भी। जिस चौकी पर पहुंचना था वह कुछ ही फर्लांग पर सामने दिखाई दें रही थी ऑफिसर रुका, उसके साथ ही सभी सिपाही भी रुक गये उसने पीछे मुड़ कर कहा—देखो अब तुम लोग अपने स्थान पर आ गये अब तुम लोग जाओ हम यहां से आगे नहीं जा सकते। सैनिकों ने सैल्यूट किया और आगे की ओर चल पड़े। ऑफिसर ने सलामी लीं पर आगे नहीं बढ़ा। सैनिकों ने दस गज आगे जाकर फिर पीछे की ओर उत्सुकता पूर्वक देखा कि साहब किधर जा रहे हैं किन्तु वे आश्चर्य चकित थे कि वहां न तो कोई साहब था और न ही कोई व्यक्ति। दूर-दूर तक दृष्टि दौड़ाई पर कहीं कोई दिखाई न दिया।
सिपाही चौकी पर पहुंचे जहां कमाण्डर उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। रात में वायरलेस सम्पर्क टूट गया था सैनिक कमाण्डर ने आते ही पूछा—तुम लोग इस बीहड़ मार्ग में इतनी जल्दी कैसे आ गये। तो उन्होंने बताया कि एक लेफ्टिनेंट इन्हें यहां तक लेकर आये वे एक फर्लांग पहले कहीं अदृश्य हो गये।
लेफ्टिनेंट?—उन्होंने आश्चर्य पूर्वक कहा यहां तो कोई भी लेफ्टिनेंट नहीं तुमको जिस व्यक्ति ने रास्ता दिखाया उसका हुलिया क्या था। सिपाहियों ने एक ही हुलिया बताया, कमाण्डर आश्चर्य चकित रह गया उनका कथन सुनकर, क्योंकि जिस लेफ्टिनेंट के बारे में उन्होंने बताया, उनकी मृत्यु उसी स्थान पर एक ही दिन पहले गोला लगने से हो गई थी।
गोला लगने के बाद लेफ्टिनेंट की मृत्यु हो गई। युद्ध के समय कोई इच्छा या वासना न होना स्वाभाविक है। उस समय चित्तवृत्तियां एकाग्र रहती हैं। ध्यानस्थ एकाग्रता के साथ हुई मृत्यु के बाद लेफ्टिनेंट की जीवात्मा को मृत्यु के बाद ही नींद नहीं आई उस समय भी उन्हें अपने कर्तव्य का भाव बना रहा। उन्होंने देखा कि इन सैनिकों को सहायता की आवश्यकता है तभी उन्होंने अपने ही मृत शरीर में फिर से अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति द्वारा प्राणों का प्रवेश कर उससे उतनी देर काम ले लिया। टूटे-फटे शरीर को यद्यपि देर तक रहना कठिन था तथापि प्राण शक्ति द्वारा उतनी देर तक पूर्व शरीर को काम में लेकर उन्होंने देश भक्ति और कर्तव्य भावना का आदर्श रखा साथ ही सूक्ष्म शरीर की सत्ता और उसकी महान् महत्ता को भी प्रमाणित कर दिया।
पितर-सत्ताएं ऐसी ही परमार्थ-परायणता, कर्तव्य भावना और निस्पृहता के साथ अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं सहायताएं किया करती हैं।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
(श्राद्ध विशेष)
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सच्ची श्रद्धा और भक्ति भावना के साथ पितरों का स्मरण किया जाय तो वे अशरीरी किन्तु अति समर्थ सत्ताएं निश्चय ही सत्प्रयोजनों में मदद के लिए आगे आ जाती हैं। इस सन्दर्भ में द्वितीय महायुद्ध की एक घटना विलक्षण प्रमाण है। इस युद्ध-श्रृंखला में मोन्स लड़ाई का यह प्रामाणिक और सुरक्षित युद्ध दस्तावेज विद्यमान है—
इस युद्ध में ब्रिटिश सेना बुरी तरह मारी-काटी गई। कुल 500 सैनिक शेष रहे थे। जर्मन सेनायें उन्हें भी काट डालने की तैयारी में थीं। उनकी संख्या उस समय दस हजार थी। ब्रिटिश सैनिकों में से एक सिपाही ने कभी सेंट जार्ज की तस्वीर एक होटल में देखी थी। यह तस्वीर एक प्लेट में कढ़ी थी और उसके नीचे लिखा था—‘‘सेंट जार्ज इंग्लैण्ड की सहायता करने को उपस्थित हों’’ वह कभी इंग्लैण्ड के प्रख्यात सेनापति थे और अपने कई हजार सैनिकों के साथ युद्ध में मारे गये थे। उनकी याद आते ही सैनिकों ने अपनी सम्पूर्ण भावना और आत्म-शक्ति से सेंट जार्ज का स्मरण किया और दूसरे क्षण स्थिति कुछ और ही थी। बिजली सी कौंधी और 500 सैनिकों के पीछे कई हजार श्वेत वस्त्रधारी सैनिकों की-सी आभा दिखाई देने लगी। दूसरे ही क्षण दस हजार सेना मैदान में मरी पड़ी थी। रहस्य तो यह था कि किसी भी सैनिक के शरीर में किसी भी अस्त्र का कोई चोट या घाव तक नहीं था। इस घटना ने इंग्लैण्ड में एक बार तहलका मचा दिया कि सचमुच मृत्यु के उपरान्त आत्मा का अस्तित्व नष्ट नहीं होता वरन् रूपान्तर होता है और यह आत्मायें अदृश्य होते हुए भी स्थूल सहायतायें पहुंचा सकती हैं।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
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