अमृतवाणी-43/44/45

अमृतवाणी
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सुकरात का दर्शन जिन दिनों पैदा होने लगा और विद्यार्थियों को पढ़ाया जाने लगा तो हुकूमत कॉप
उठी।हुकुम दिया गया कि यह आदमी बाग़ी है।इस आदमी को ज़हर पिला देना चाहिये।डाकू-चोर एक या दो पूरे समाज को हिलाकर रख देता है।दार्शनिक
दुनिया को उलट-पलट देता है।ईसा सन्त थे,नहीं
दार्शनिक थे।सन्त तो समाज में ढेर सारे हैं,जो एक पॉव पर खड़े रहते हैं,पानी नहीं पीते,दूध नहीं पीते।बाबाजी का बात नहीं कह रहा मैं।

                             परमपूज्य गुरुदेव
                      (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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दर्शन वह है जो जमीला ने किया।जमीला ने सारी
ज़िन्दगी भर पैसे जमा किये थे और कहती थी कि मैं
कावा जाऊँगी और दर्शन करूँगी।जाने के वक़्त पड़
गया अकाल।पानी न पड़ने से,अनाज न होने से लोग
भूखों मरने लगे।जमीला ने कहा,मैं कावा हज करने
जाने वाली थी।अब हज नहीं जाऊँगी।बच्चे भूखे मर रहे हैं।इनके खाने का,दूध का,पानी का इन्तज़ाम किया जाए,ताकि वे ज़िन्दा रखे जा सकें और उसने कावा जाने से इन्कार कर दिया । मेरे पास कुछ है ही नहीं मैं कैसे जाऊँगी?इसे कहते हैं दर्शन,
फिलॉसफी।

                               परमपूज्य गुरुदेव
                      (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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बाद में ख़ुदावन्द करीम के यहॉ मीटिंग हुई तो यह तय किया गया कि हज़ किसका क़बूल किया जाए। सारे फ़रिश्तों की मीटिंग में तय हुआ कि सिर्फ़ एक आदमी ने इस साल हज़ खुलकर किया।
ख़ुदावन्द ने उसका नाम बताया-जमीला।फ़रिश्तों ने
अपने रजिस्टर दिखाये व कहा कि वह तो गई ही नहीं।ख़ुदावन्द ने समझाया-देखने के लिये न गई तो
न सही,लेकिन उसने कावा के ईमान को,प्रेरणा को
समझा और हज़ करके जो अन्तरंग में बिठाया जाना
चाहिये था,वह वहीं बैठकर लिया।शेष सब झक
मारते रहे।इसलिये सबका नामंज़ूर ।जमीला का
क़बूल ।

                                 परमपूज्य गुरुदेव
                        (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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