अमृतवाणी-112/113/114

अमृतवाणी
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मित्रो ! हमें अपने स्वार्थ को जानना चाहिये।स्वार्थ
क्या है ? स्वार्थ यह है कि हम जीवन में तरक़्क़ी करें।तरक़्क़ी से हमको आत्मसन्तोष,यश मिलेगा और इतिहास के पन्नों पर हम अपना नाम छोड़कर
जा सकेंगे।हमारा स्वार्थ और भी है कि इस दुनिया में
जो ख़ुशी हमको मयस्सर न हो सकी,वो ख़ुशी ज़िन्दगी में आनी चाहिये।ख़ुशी-प्रसन्नता के समावेश का नाम है-स्वर्ग।स्वर्ग कोई गॉव,बस्ती, कोई लोक नहीं है।फिफ्थ डायमेंशन,फोर्थ डायमेंशन ये विचारों और चिन्तन के डायमेंशन
होते हैं।स्वर्ग भी एक डायमेंशन है-हमारे दृष्टिकोण का।इसमें हम देखना शुरु करते हैं तो इस दुनिया में बड़ी ख़ुशी,ख़ूबसूरती,आनन्द और तरह-तरह के नज़ारे दिखाई पड़ते हैं।हमको बेहद शान्ति दिखाई पड़ती है चारों ओर।इसका नाम है-स्वर्ग।

                         परमपूज्य गुरुदेव
                 (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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नर्क क्या है ? नर्क उसी का नाम है कि जहॉ कहीं भी
हम निगाह फेंकते हैंअथवा स्पर्श करते हैं,हाथ डालते
संबंध बनाते हैं,वो सब बाग़ी हो जाते हैं।कौन-कौन
बाग़ी हो जाते हैं-हमारी बीबी,हमारे बच्चे,हमारे पड़ोसी,हमारा समाज,यहॉ तक कि हमारा शरीर भी कहता है मारूँगा डण्डे से आपको।हमारा चिन्तन,
दृष्टिकोण जब विकृत हो जाता है तो हमारा शरीर,
दिमाग़ बग़ावत कर देता है।हमारे कम्प्यूटर ने हमारे
विरुद्ध झँडा खड़ा कर दिया कि आपको सोने नहीं
देंगे,चैन से रहने नहीं देंगे।चिंताओं,निराशाओं से दिमाग़ हैरान हो जाता है।बेटे ! हमारे जीवन में नर्क भी हैऔर स्वर्ग भी,बन्धन भी है और मुक्ति भी।

                            परमपूज्य गुरुदेव
                     (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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हमारा परमार्थ इस बात में है कि हम इन्सान की ज़िन्दगी अपनाकर सादा जीवनयापन करें,कम में
गुज़ारा करें,कम ख़र्च में काम चलायें और जो हमारे
शारीरिक,मानसिक,आर्थिक एवं अन्य प्रकार के साधन बच जाते हैं,उनको भगवान के काम में लगायें
भगवान की बैंक में जमा करें,ताकि हज़ारों गुना होकर के फिर हमारे पास आये और भगवान हमारी
ईमानदारी पर विश्वास करें।हमारा जो प्रमोशन है
देवता का,अवतार का,ये सारे के सारे प्रमोशन हमको टाइम पर मिलते चले जायें।ये हमारा परमार्थ
है-भगवान को प्रसन्न करना,जीवन में उदार होना।हम एकादशी उपवास करें तो ? मर्ज़ी है आपकी।
पेट अच्छा होगा,पर एकादशी व्रत भर से भगवान प्रसन्न नहीं होता,उदारता और परमार्थ परायणता के
बिना।इसीलिये,मित्रों ! मैं यह कहता हूँ कि भगवान
की प्रसन्नता के लिये फिर एक बार समझिये।भगवान का स्वरूप आदमी की संवेदना में,उदारता के रूप में,परमार्थपरायणता,लोकमंगल के रूप में होना चाहिये और इस विश्व को सुखद,सम्मुन्नत
बनाने के रूप में होना चाहिये।न भगवान का रूप
इससे कम में है और न इससे ज़्यादा होने की ज़रूरत है।

                           परमपूज्य गुरुदेव
                   (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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