अमृतवाणी-145/146/147/48
परशुराम जी का नाम आपने सुना होगा।उन्हें शंकर भगवान ने एक कुल्हाड़ा दिया था।उस कुल्हाड़े से उन्होंने लोगों के सिर काट डाले थे।जो ख़राब दिमाग वाले थे, बददिमाग वाले थे, उन बददिमाग वालों के सिर काटकर परशुराम जी ने फेंक दिये थे और वह भी इक्कीस बार।सिर काटने से मतलब ? सिर काटना तो मेरे ख़याल से ॠषि के लिए क्या संभव रहा होगा ? यह कथन तो आलंकारिक मालूम पड़ता है।दिमाग बदलने के लिए विचार-क्रान्ति की दृष्टि से हम लगभग वही काम कर रहे हैं,जो कि परशुराम जी ने फरसा लेकर किया था। फरसा तो हमारे हाथ में नहीं है, मग़र कलम जिन्दा है।दोनों चीजें हमारे हाथ में है और उन्हीं के सहारे हम लोगों के दिमागों को बदलने के लिए निरंतर प्रयत्नशील हैं।परशुराम जी यमुना जी को लाये थे और फरसा भी लाये थे।परशुराम जैसा लगभग वही काम हमने किया है।
प्रायः सभी ॠषि उत्तराखंड में ही हुये हैं।ऋषियों ने इसी पुनीत भूमि में रहकर तपस्या की,ताकि अध्यात्म शक्तियों को ठीक ढंग से संभाल सकें।इसलिए उन्होंने इसी स्थान को चुना था।हमने भी इसे ही चुना है। हमारा और आपका मिलन हो सके, इसलिए हिमालय की यहाँ से शुरुआत होती है-हरिद्वार से, उस स्थान पर हम बैठे हैं ताकि आपके लिए भी यहॉ आने में मुश्किल न हो।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
चरक ॠषि को आप जानते हैं क्या ? चरक ॠषि प्राचीनकाल में हुये हैं।उन्होंने दवाओं, प्राकृतिक औषधियों के संबंध में शोधें की थीं, खोजें की थीं।उनका स्थान केदारनाथ के पास था, जहाँ सिक्खों का गुरुद्वारा है।केदारनाथ के पास फूलों की घाटी है,जो उन्हें बहुत प्रिय थी। अब तो वहां तोड़-फोड़ के कारण सब जड़ी- बूटियाँ नष्ट हो गई हैं, लेकिन अगर कभी आपको फूलों की घाटी देखने का मन हो तो आप गोमुख से आगे ऊपर तपोवन जाना-नन्दनवन जाना। तपोवन और नन्दनवन ऐसे स्थान हैं जहां विचित्र दुर्लभ फूलों की छटा देखते ही बनती है। इनमें ब्रह्मकमल भी शामिल है। वह आपको वहीं मिलेगा। चरक के रास्ते पर हम भी चले हैं।वनौषधियों के प्राचीन श्लोकों को ठीक तरीके से यहाँ ब्रह्मवर्चस शोध-संस्थान की स्थापना की है।जो कुछ भी संभव है पुराना और अर्थात् पुराने ढंग से शोध की जाती थी और नये ढंग से कैसे की जाती है ? यह हमने यहाँ बनाने की कोशिश की है।
उत्तरकाशी में आरण्यक हैं। आरण्यक किसे कहते हैं ?
आरण्यक उसे कहते हैं जहाँ लोग वानप्रस्थ लेकर समाज-सेवा के लिये समर्पित हो जाते हैं, उनके निवास स्थान को आरण्यक कहते हैं, गुरुकुल छोटे बच्चों का होता है।विद्यार्थियों का होता है।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
(श्राद्ध विशेष)
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आध्यात्मिकता का उद्देश्य भी परमात्मा अथवा विश्व की किसी महान् रक्षा करने वाली शक्ति के साथ जोड़ना है। ब्रह्माण्ड का अस्तित्व और इसका सत्य जिसके अन्तर्गत सम्भवतः लाखों विश्व हैं—जिनका कोई अन्त नहीं है, हमारी इन्द्रियों और बुद्धि के अनुभव की वस्तु है। ऊपर से देखने पर तो यह पता चलता है कि ब्रह्माण्ड अव्यवस्थित है पर जब सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, हर्शल प्लूटो और अन्य ग्रह-नक्षत्रों की गतिविधियों पर दृष्टि दौड़ाते हैं तो लगता है, सब कुछ व्यवस्था और नियम के अन्तर्गत चल रहा है। जिससे स्पष्ट पता चलता है कि सबको जोड़ने वाली एक शक्ति है, जो प्रकृति अथवा बुद्धि का कोई अंश नहीं है वरन् वह नितान्त स्वतन्त्र, निर्लेप, बन्धनमुक्त है। मनुष्य में स्वयं भी उसी शक्ति का प्रकाश विद्यमान है। किन्तु वह मांस-मज्जा की कारा में बँधकर अपने को उन्हीं से जुड़े संवेदनों तक सीमित मान बैठता है। जैसा कि श्री सी.डब्लू. लेडबीटर ने ‘‘इनविजिबुल हेल्पर्स’’ में लिखा है—उच्चतर लोगों में क्रियाशील अशरीरी पितर-सत्ताएं जब मनुष्यों को देखती हैं, तो वे उन्हें अस्थि-मांस के पिण्ड में कैद हो गया देखकर दुःखी भी होती हैं, करुणाभिभूत भी। सामान्य जन मृत व्यक्ति को सुख-आनन्द से वंचित हो गया मान बैठता है, जब कि वे सत्ताएं देखती हैं कि अपनी संकीर्णताओं में घिरा शरीरधारी मानव ही सहज आनन्द से वंचित है। ऐसे वंचितों में से जो भी आनन्दपूर्ण प्रकाश की दिशा में बढ़ते हैं, या जिनमें भी बढ़ने की सम्भावना होती है, अथवा जो कषाय-कल्मषों से अधिक लिप्त नहीं होते, उनको सहायता देने के लिए वे पितर-सत्ताएं सदैव जागरूक रहती हैं।
निर्दोष बच्चों तथा सज्जनवृत्ति के लोगों की संकट के समय में ये पितर-सत्ताएं आकस्मिक सहायता प्रदान करती हैं और विपत्तियों के पहाड़ के नीचे दबने पर भी उनका बाल-बांका नहीं होता।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
अमेरिका के ऐरिजेना प्रान्त में कुछ खाई खड्डों से भरे सघन वन प्रदेश ऐसे हैं जो न केवल अगमय और डरावने हैं वरन् उनमें रहस्य भरी विशेषताएं भी पाई जाती हैं। यह रहस्य अलौकिक वादियों और वैधानिक शोधकर्ताओं के लिए एक पहेली बनी हुई है।
कहा जाता है कि उस प्रदेश में या तो आसमान से सोने के धूलिकण बरसते हैं या फिर पहाड़ उसे अदृश्य लावे की तरह उगलते हैं। जो हो उस क्षेत्र की पहाड़ियों को सोने के पर्वत का नाम दिया जाता है और अनेकों उस सम्पदा को सहज ही प्राप्त कर लेने के लालच में उधर जाते भी रहते हैं।
सम्पत्ति का लोभ जितना आकर्षक है उतना ही वहां के प्रहरी प्रेत पिशाचों के आतंक का भय भी बना रहता है। इस उपलब्धि के लिए अब तक सहस्रों दुस्साहसी उधर गये हैं। इनमें से अधिकांश को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा है। जो किसी प्रकार जीवित लौट आये हैं उनने सोने के अस्तित्व का तो आंखों देखा विवरण सुनाया है, पर साथ ही यह भी कहा है कि वहां अदृश्य आत्माओं का आतंक असाधारण है। वे सोना बटोरने के लालच से जाने वालों का बेतरह पीछा करती हैं और यदि भाग खड़ा न हुआ जाय तो जान लेकर ही छोड़ती हैं।
"परमपूज्य गुरुदेव"
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