अमृतवाणी-118/119/120

अमृतवाणी
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स्वाध्याय और सत्संग क्या है ? श्रेष्ठ पुरुषों का सानिध्य और सद्ज्ञान के प्रति निष्ठावान होना।अगर दो काम आपने नहीं किये हैं तो आप ग्यारह माला जपें,चाहे ग्यारह हजार माला जपें,कुछ नहीं होने वाला।विचारों को आप काटते नहीं हैं।जीवन को ऊँचा उठाने के लिए जिस क्रेन की जरूरत है,उससे आपका सम्पर्क ही नहीं है।आप जान को तो निकाल देते हैं और लाश को लिये फिरते हैं।लाश को लेने से काम नहीं चलेगा,दिशाओं को लेने से काम चलेगा।मित्रो ! आज हमने शिक्षण किया यज्ञोपवीत का,जिसे चौबीसों घंटे कंधे पर धारण करते हैं।हम इसकी
शिक्षाओं को,जीवन के लक्ष्य को ध्यान रखेंगे,भुलायेंगे नहीं।हर साल इसको रिन्यू कराते हैं। टट्टी-पेशाब के समय
आपको यज्ञोपवीत का ध्यान रखना चाहिए।जब पुराना हो जाता है,छह महीने हो जाते हैं,तब इसे आपको बदल देना चाहिए।क्यों ? बार-बार हमें ध्यान रहे कि जनेऊ का भी हमारे जीवन में कुछ काम है ।

                               परमपूज्य गुरुदेव
                       (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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भवानी शंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्तस्थमीश्वरम् ।।
मित्रो !
गोस्वामी तुलसीदास जी जब रामायण का निर्माण करने लगे तो उनके मन में एक विचार आया कि इतना बड़ा ग्रंथ जिसके जहाज पर बिठा करके संसार के प्राणियों का उद्धार किया जा सकता है, उसे बनाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए ? इसके लिए किस शक्ति की सहायता लेनी चाहिए  ? उन्होंने यह कहा कि भवानी-शंकर की वंदना करनी चाहिये और उनकी सहायता लेनी चाहिए।उनकी शक्ति के बिना इतना बड़ा रामचरितमानस, जिस पर बिठा करके अनेक मनुष्यों को भवसागर से पार किया जा सकता है, कैसे संभव होगा  ? उन्होंने भवानी और शंकर की वंदना की।जैसे कि सायंकाल आरती के समय हमने और आप लोगों ने भगवान शंकर और पार्वती की वंदना की ।पश्चात उनके जी में एक और विचार आया कि भगवान शंकर हैं क्या  ? शक्ति कहॉं से आती जाती है ? क्यों आ जाती है  ? उद्धार कैसे हो सकता  है ? ऐसे अनेक प्रश्न तुलसीदास जी के मन में उत्पन्न हुये । उनका समाधान भी उसी श्लोक में हुआ जिसका कि मैंने आप लोगों के सम्मुख विवेचन किया-
"भवानी शंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ"भवानी शंकर की हम वंदना करते हैं ।

                                 परमपूज्य गुरुदेव
                         (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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ये कौन हैं ? 'श्रद्धा विश्वास रूपिणौ ' अर्थात श्रद्धा का नाम पार्वती और विश्वास का नाम शंकर ।श्रद्धा और विश्वास-इन दोनों का नाम ही शंकर-पार्वती है ।इनका प्रतीक विग्रह, मूर्ति हम मंदिरों में स्थापित करते हैं ।इनके चरणों पर अपना मस्तक झुकाते हैं, जल चढ़ाते हैं, बेलपत्र चढ़ाते हैं, आरती करते हैं ।यह सब क्रिया-कृत्य करते हैं, लेकिन मूलतः शंकर हैं क्या ? श्रद्धा और विश्वास ! 'याभ्यां बिना न पश्यन्ति'- जिनकी पूजा किये बिना क़ोई सिद्ध पुरुष भी भगवान को प्राप्त नहीं हो सकते ।भवानी शंकर की इस महत्ता और माहात्म्य पर मैं विचार करता रहा तब तक एक और पौराणिक कथा मेरे सामने आई कि जब भगवान परशुराम को यह मालूम पड़ा कि सब जगह अन्याय, अत्याचार फैल गया, अनाचार फैल गया ।इसके निवारण के लिए क्या करना चाहिए ? परशुराम जी उत्तरकाशी गये और वहॉ भगवान शिव का तप करने लगे ।तप करने के पश्चात भगवान शंकर ने उन्हें एक परशु दिया और कहा-अनीति का, अन्याय का और अत्याचार का इस संसार में से उच्छेदन किया जा सकता है और आपको करना चाहिए ।
पर आज हम देखते हैं कि वह शक्ति कुंठित कैसे हो गई  ?
हम शंकर की पूजा करते हैं, पर समस्याओं से घिरे क्यों हैं  ? शंकर की शक्ति वरदान हो करके सामने क्यों नहीं आती ? शंकर के भक्त होते हुए भी हम किस तरीके से पिछड़ते और पददलित होते चले जा रहे हैं  ? भगवान हमारी सहायता कब करेंगे ? यह विचार मैं देर तक करता रहा ।

                              परमपूज्य गुरुदेव
                       (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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