सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-22
इस बार महिला जेल की बारी थी, वहां पहुँचने पर पता चला कि जो बहन बहुत ही भावपूर्ण ढंग से भजन गाती है, वह आज अपनी बैरक में से बाहर ही नहीं निकली थीं, सुबह से ही रो रही थी, कारण पूछने पर पता चला कि उसका आदमी पुरुष जेल में है और तबियत खराब होने की खबर मिली है, शायद अस्पताल में भर्ती कराया गया है।उसे बुलवाया तथा समझा-बुझाकर यज्ञ करने तथा उसके स्वास्थ्य लाभ के लिये आहुतियां देने के लिए तैयार किया।आज पहली बार यज्ञ था,यज्ञ का सारा सामान हम लोग लेकर पहुँचे थे। सभी बहनों ने यज्ञ किया, सत्संकल्प दोहराये, आरती के बाद प्रसाद की बारी आई तो सबको इन्तज़ार रहता था कि आजप्रसाद में क्या आया होगा ? हम लोग जान-बूझकर उनको नहीं दिखाते थे ताकि वे अचानक से खुश हो जायें।
सुमन कँवर (बदला हुआ नाम) और उसके पति ने जमीन-जायदाद के झगड़े में गॉव के सरपंच को मार डाला था,दोनों ही कम उम्र के थे। बच्चे नहीं थेऔर दोनों ही अलग-अलग जेल में थे। जब सबने प्रसाद ले लिया तब सुमन ने ज़िद पकड़ ली,मम्मी जी मेरे पति को प्रसाद पहुँचा दो।वो बड़े अस्पताल में भर्ती है। बड़ी मुश्किल में आ गये हम सभी।सबको घर भी जाना है, उसके पति को मिलने जाने का मतलब है कि पहले पुरुष जेल जाओ, वहां से पता करो,फ़िर अस्पताल जाकर जेल पुलिस की इजाज़त लेकर उससे मिलो। बहुत देर तक भटकने और बिना कारण प्रशासन की निगाह में आने वाली बात थी कि आख़िर हमारा क्या मतलब है ? जैसे-तैसे समझा-बुझाकर हम सभी वापस आये कि रास्ते में शांति माताजी ने ज़िद पकड़ ली कि तुम दोनों सीधे अस्पताल जाओ वहॉ से पता लग जायेगा। सुमन को तो समझा कर बाहर आ गये लेकिन अब उन्हें कैसे समझाया जाए, आखिरकार वे सब बहनें अपने-अपने घर चलीं गईं, और हम दोनों सीधे अस्पताल पहुँचे वहॉ इमरजेन्सी में पता करने पर उन्होंने वार्ड नं बता दिया, इससे पहले व्यक्तिगत तौर पर हम उसे नहीं मिले थे लेकिन हमारी पीली पोशाक देखकर वह समझ गया, उसके पैर का ऑपरेशन था।उसे हिम्मत बंधाई,प्रसादऔर कुछ फल जो रास्ते से खरीदे थे उसे दिये। पुलिस वालों कोअपना फोन नंबर देकर आ गये कि कोई जरूरत हो तो बता देना।
अब दुबारा महिला जेल जाकर सूचना नहीं दी जा सकती थी,अत: हम घर लौट आये।
क्रमशः!
'गुरुकॄपा केवलम्'
" गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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