अमृतवाणी-149/150/151

(श्राद्ध विशेष)
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इन पितर-सत्ताओं की करुणा और शक्ति के परिचय-प्रमाण देने वाली घटनाएं आये दिन बड़ी संख्या में देखी सुनी जाती हैं।
श्री लेडबीटर ने अपनी उपरोक्त पुस्तक में ऐसे अनेक उदाहरण और अनुभव प्रस्तुत किए हैं—
‘‘एक बार लन्दन की हालबर्न सड़क में भयंकर आग लग गई थी। उसमें दो मकान जलकर राख हो गये। उस घर में एक बुढ़िया को जो धुएं के कारण दम घुट जाने से पहले ही मर गई थी छोड़कर शेष सबको बचा लिया गया। आग इतनी भयंकर लगी थी कोई भी सामान नहीं निकाला जा सका।’’
‘‘जिस समय दोनों मकान लगभग पूरे जल चुके थे, तब घर की मालकिन को याद आया कि उसकी एक मित्र अपने बच्चे को एक रात के लिये उसके पास छोड़कर किसी कार्यवश कालचेस्टर चली गई थी। वह बच्चा अटारी पर सुलाया गया था और वह स्थान इस समय पूरी तरह आग की लपटों से घिरा हुआ था, आग की गर्मी से उस समय पत्थर भी मोम की तरह पिघला कर टपक रहे थे।’’
‘‘ऐसी स्थिति में बच्चे के जीवन की आशा करना ही व्यर्थ था फिर उसकी खोज करने कौन जाता। पर एक आग बुझाने वाले ने साहस साधा, उपकरण बांधे और उस कमरे में जो पहुंचा, जहां बच्चा लिटाया गया था। उस समय तक फर्श का बहुत भाग जल कर गिर गया था किन्तु आग कमरे में गोलाई खाकर अस्वाभाविक और समझ में न आने वाले ढंग से खिड़की की तरफ निकल गई थी। उस गोल सुरक्षित स्थान में बच्चा ऐसा लेटा था, जैसे कोई अपनी मां की गोद में लेटा हो। बाहर का दृश्य देखकर यह भयभीत अवश्य था पर उसकी तरफ एक भी आग की चिनगारी बढ़ने का साहस न कर रही थी। जिस कौने पर बच्चा सोया था, वह बिल्कुल बच गया था। जिस पटिये पर खाट थी, वह आधे-आधे जल गये थे पर चारपाई के आस-पास कोई आग न थी, वरन् एक प्रकार का दिव्य तेज वहां भर रहा था। जब तक आग बुझाने वाले ने बच्चे को सकुशल उठा नहीं लिया, वह प्रकाश अपनी दिव्य प्रभाव बिखराता रहा पर जैसे ही वह बच्चे को लेकर पीछे मुड़ा कि आग वहां भी फैल गई और दिव्य तेज अदृश्य हो गया।’’
बर्किंघर शायर में बर्नहालवीयो के निकट हुई, एक घटना में इस तरह का दैवी हस्तक्षेप लगभग एक घण्टे तक दृश्यमान् रहा। एक किसान अपने खेत पर काम कर रहा था। उसके दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे, जो पेड़ के नीचे छाया में खेल रहे थे। किसान को ध्यान रहा नहीं दोनों बालक खेलते-खेलते जंगल में दूर तक चले गये और रात्रि के अंधेरे में भटक गये।
इधर किसान जब घर पहुंचा और बच्चे न दिखाई दिये तो चारों तरफ खोज हुई। परिवार और पड़ौस के अनेक लोग उस खेत के पास गये, जहां से बच्चे खोये थे। वहां जाकर सब देखते हैं कि दीप-शिखा के आकार का एक अत्यन्त दिव्य नीला प्रकाश बिना किसी माध्यम के जल रहा है, फिर वह प्रकाश सड़क की ओर बढ़ा यह लोग उसके पीछे अनुसरण करते चले गये। प्रकाश मन्दगति से चलता हुआ, उस जंगल में प्रविष्ट हुआ जहां एक वृक्ष के नीचे दोनों बच्चे सकुशल सोये हुए थे। मां-बाप ने जैसे बच्चों को गोदी से उठाया कि प्रकाश अदृश्य हो गया।

                           परमपूज्य गुरुदेव
                 (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

(श्राद्ध विशेष)
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बिहार में एकबार जोरदार भूकम्प आया। कई दिन तक रह रहकर पृथ्वी कांपी और जब स्थिर हुई तब पता चला कि नगर के नगर ध्वस्त हो चुके हैं। हजारों व्यक्तियों की जानें गई इस दुर्घटना में। मुंगेर नगर में उस दिन बाजार थी। दोपहर का समय था हजारों व्यक्ति क्रय-विक्रय करने में तल्लीन थे तभी आया भूचाल और उन हजारों दुकानदारों तथा खरीददारों को मकानों के मलबे में दाब कर चला गया।
पीछे आये सहायता दल सिपाही-सैनिक और समाज सेवी संस्थायें। मलबे की खुदाई प्रारम्भ हुई। एक दो दिन तक तो कुछ लोग जीवित कुछ चोट खाये निकलते रहे पर तीसरे दिन जो लाशें निकलनी शुरू हुई तो फिर पन्द्रह दिन तक लाशें ही निकलती रहीं ढेर लग गया मृतकों का।
गिरे हुये मकानों का मलबा निकालने का काम अभी तक बराबर चल रहा था। एक स्थान पर काम चल रहा था, एकाएक कुछ लोग चौंके क्योंकि नीचे से आवाज आ रही थी—‘‘थोड़ा धीरे से खोदना। 15 दिन तक जमीन में दबे रहने पर भी यह कौन जीवित बचा है इस आश्चर्य और विस्मय से सभी का मन भर गया। सावधानी से मिट्टी हटाई जाने लगी।’’
कई बड़ी-बड़ी धत्रियां तथा शहतीरें निकालने के बाद निकल एक अधेड़ आयु का व्यक्ति केले के छिलकों में पड़ा हुआ, एक भी चोट या खरोंच नहीं थी उसे सबसे आश्चर्य भरी बात तो यह थी ढेर सारी मिट्टी और तख्तों के नीचे दबे उस आदमी ने बिना खाये पिये सांस लिए 15 दिन कैसे काट दिये।
उसी से पूछा गया—भाई तुम कैसे बच निकले तो उसने आप बीती घटना इस प्रकार सुनाई—
‘‘मैं आया था—केले बेचने, इस मकान की दालान के सिर नीचे पर टोकरी रखे खड़ा था कि भूचाल आ गया। छत टूट कर ऊपर आ गिरी मैं दब गया टोकरी कुछ इस प्रकार उल्टी कि सारे केले उसके नीचे आ गये और इस तरह वे पिचलने या सड़ने गलने से बच गये। इसी में से निकाल-निकाल कर केले खाता रहा।’’
‘‘पेट के नीचे का भाग कुछ इस तरह मिट्टी से पट गया कि सिरोभाग से कमर भाग का सम्बन्ध ही टूट गया। टट्टी पेशाब की बदबू से इस प्रकार बचाव हो गया।’’ ‘‘एक बार पृथ्वी फिर हिली और उसके साथ ही हिला यह मलबा, न जाने कैसे एक सूराख हो गया वह हलकी सी धूप की गर्मी भी देता रहा और शुद्ध हवा भी। अब जीते रहने के लिए एक ही वस्तु आवश्यक रह गई थी वह थी पानी। दैवयोग से पृथ्वी तिबारा कांपी तब इस दुकान का फर्श टूटा और उसके साथ ही पानी की एक लहर इधर आ गई और इस गड्ढे को पानी से ऊपर तक भर गई। हवा और धूप यों छेद से मिल गये। केले पास थे ही, पानी भी परमात्मा ने भेज दिया। यह सब व्यवस्थायें भगवान् ने जुटा दीं तो मुझे विश्वास हो गया कि मुझे अभी नहीं मरना।’’
‘‘इसी विश्वास के सहारे आज तक जीवित रहा। आज का दिन आखिरी दिन है जबकि सब केले समाप्त हो गये हैं, पानी नहीं बचा है, रोशनी भी नहीं आ रही थी पर आप सब लोग आ गये सो मैं आप लोगों को भगवान् की मदद ही मानता हूं।’’ इतना कहकर उसने कृतज्ञता की दो बूंद आंखों से लुढ़का दीं।
इस घटना का वर्णन महात्मा आनन्द स्वामी ने ‘एक ही रास्ता’ पुस्तक में किया है इस तरह की घटनायें बताती हैं कि अदृश्य सत्ताएं सत्पुरुषों और पीड़ितों की मदद के लिए सदैव आगे आती हैं।

                                 परमपूज्य गुरुदेव
                        (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

(श्राद्ध विशेष)
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पितृ-पक्ष का हिन्दू-धर्म और हिन्दू-संस्कृति में बड़ा महत्व है। जो पितरों के नाम पर श्राद्ध और पिण्डदान नहीं करता, वह सनातन धर्मी हिन्दू माना नहीं जा सकता। हिन्दू-शास्त्रों के अनुसार मृत्यु होने पर मनुष्य का जीवात्मा चन्द्रलोक की तरफ जाता है और ऊंचा उठकर पितृ-लोक में पहुंचता है। इन मृतात्माओं को अपने नियत स्थान तक पहुंचने की शक्ति प्रदान करने के लिए पिण्डदान और श्राद्ध का विधान किया गया है। श्राद्ध पितरों के नाम पर ब्राह्मण-भोजन भी कराया जाता है। इसके पुण्य-फल से भी पितरों का संतुष्ट होना माना गया है। धर्म-शास्त्रों में यह भी कहा है कि जो मनुष्य श्राद्ध करता है वह पितरों के आशीर्वाद से आयु, पुत्र, यश, बल, वैभव, सुख और धन-धान्य को प्राप्त होता है। इसीलिये धर्म-प्राण हिन्दू आश्विन मास के कृष्ण पक्ष भर प्रतिदिन नियम पूर्वक स्नान करके पितरों का तर्पण करते हैं। जो दिन उनके पिता की मृत्यु का होता है, उस दिन अपनी शक्ति के अनुसार दान करके ब्राह्मण-भोजन कराते हैं।
एक समय इस देश में श्राद्ध-कर्म का इतना प्रचार था कि उसके ध्यान में लोग अपने तन-बदल की सुधि भूल जाते थे। उन्हें बाल बनवाने, तेल लगाने, पान खाने आदि का भी अवकाश न मिलता था। उसी बात के चिह्न स्वरूप आज प्रायः सभी हिन्दू, चाहे वे श्राद्ध करने वाले न भी हों, इन कार्यों से पृथक रहना धर्मानुकूल मानते हैं। वैसे जिन लोगों के पिता स्वर्गवासी हो गये हैं, वे अमावस्या तक और जिनकी माता स्वर्गवासी हो गई हैं, वे मातृ-नवमी तक न तो बाल बनवाते हैं और न तेल लगाते हैं।
पितरों का पिण्डदान करने का सबसे बड़ा स्थान गया माना जाता है और जनता में ऐसी मान्यता है कि गया में पितरों को पिण्डदान कर देने पर फिर प्रति वर्ष पिण्ड देने की आवश्यकता नहीं रहती। यह भी कहते हैं कि महाराज रामचन्द्रजी ने गया आकर फल्गू किनारे अपने मृत पिता महाराज दशरथ का पिण्डदान किया था। कुछ भी हो इस प्रथा से इतना प्रत्यक्ष जान पड़ता है कि हिन्दुओं की सभ्यता प्राचीन काल में काफी ऊंचे दर्जे तक पहुंच चुकी थी और जीवित माता-पिता की सेवा करना ही अपना परम धर्म नहीं मानते थे, वरन् उनके मरने पर भी उनकी स्मृति-रक्षा करना अपना परम कर्तव्य समझते थे और इसके लिए 15 दिन का समय अलग दिया था। हिन्दुओं की इस प्रथा की प्रशंसा अन्य लोगों ने भी की। हिन्दुस्तान के मुगल सम्राट शाहजहां ने, जब उसे उसके लड़के औरंगजेब को लिखा था कि ‘‘तुम से तो हिन्दू लोग ही बहुत अच्छे हैं जो मरने के बाद भी अपने पिता को जल और भोजन देते हैं तू तो अपने जीवित पिता को भी दाना-पानी के बिना तरसा रहा है।’’
                                 परमपूज्य गुरुदेव
                       (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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