गुरुगीता-18
शेख़ फ़रीद को बहुत कम आयु में ही रूहानियत की गहरी लगन थी। उन्होंने ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का नाम सुना हुआ था जो राजस्थान के एक शहर अजमेर में रहते थे। उनसे दीक्षा लेने जब अजमेर पहुँचे तो देखा कि वे एक सूखे पेड़ का सहारा लेकर बैठे हैं।
फ़रीद को इस बात की बहुत हैरानी हुई कि एक कामिल फ़क़ीर ने पेड़ का सहारा लिया हो और वह पेड़ भी सूखा हो! उन्होंने अपनी योगशक्त्ति का प्रयोग करते हुए सूखे पेड़ पर दृष्टि डाली और वह एकदम हरा हो गया। ख़्वाजा साहिब ने यह सब देखा और पेड़ पर नज़र डाली, वह पहले की तरह फिर से सुख गया। फ़रीद नही चाहता था कि पेड़ इसी तरह सूखा रहे। उन्होंने एक बार फिर उसे हरा कर दिया और ख़्वाजा साहिब ने पल-भर में उसे वापस उसी हालत में पहुँचा दिया।
ख़्वाजा साहिब फ़रीद की ओर मुड़े और बोले बेटा, तुम यहाँ रूहानी राज़ जानने और मालिक से मिलाप करने के लिए आये हो या क़ुदरत के कानूनों में दख़ल देने के लिए? परमात्मा के हुक्म से ही यह पेड़ सुख गया है। तुम क़ुदरत की व्यवस्था में दखल देकर इस सूखे पेड़ को बार-बार हरा क्यों करना चाहते हो? जाओ, अब तुम दिल्ली में क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी के पास जाओ। वही तुम्हारे मन की हालत देखकर तुम पर बख्शिश करेंगे।
हुकुम के अनुसार फ़रीद दिल्ली पहुँच गये। वहाँ पहुँचकर क्या देखते है कि क़ुतुबुददीन, जो उस समय अभी बालक ही थे, अपने साथियों के साथ खेल रहे हैं। कुछ देर तक संदेहपूर्ण दृष्टि से फ़रीद उन्हें देखते रहे, फिर अपने मन में सोचा, यह नादान बालक भला मुझे क्या शिक्षा देगा!
हज़रत क़ुतुबुद्दीन देखने में तो बालक थे, लेकिन उनकी रूहानी अवस्था ऊँची थी। खेल छोड़कर वे पास की कोठरी में गये और एक मिनट बाद ही सफ़ेद लंबी दाढ़ी वाले बुज़ुर्ग के रूप में बाहर आ गये और कहने लगे, अब तो तुम्हारा मुर्शिद बनने के लिए मैं पूरा बुज़ुर्ग और समझदार दिखायी देता हूँ? फ़रीद को अपनी अज्ञानता और अहंकार का एहसास हो गया और शर्म से उनकी गर्दन झुक गयी। घुटनों के बल गिरकर उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की और दया की भीख माँगी। फिर उनकी संगति में रहकर उनके सच्चे शिष्य बने और समय बीतने पर खुद कामिल फ़क़ीर बने।
गुरुगीता
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एवं गुरुपदं श्रेष्ठं देवानामपि दुर्लभम् ।
हा हा-हा-हा हूँ गणैश्चैव गन्धर्वाद्यैश्च पूज्यते ।।20।।
अर्थ
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इस प्रकार श्रेष्ठ गुरु शब्द देवता गण को भी दुर्लभ है।हा हा-
हू हू-गण एवं गन्धर्व समूह भी इनकी पूजा करते हैं, अर्थात्
गुरु शब्द का ध्यान करते हैं ।।20।।
20. It is this way that the most benedictory word "Guru" is rare even for rare even for "devtas". The "Ha Ha Hoo Hoo" group of gandharvas (divine singers) also worship the Master . They also meditate on the Master and perform the "Japa" of Guru mantra.
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