अमृतवाणी-152/153/154

(श्राद्ध विशेष)
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इस विषय पर विशेष विचार करने से यही प्रतीत होता है कि पितृ-पक्ष का महत्व इस बात में नहीं है कि हम श्राद्ध-कर्म को कितनी धूम-धाम से मनाते हैं और कितने अधिक ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, वरन् उसका वास्तविक महत्व यह है कि हम अपने पितामह आदि गुरुजनों की जीवितावस्था में ही कितनी सेवा-सुश्रूषा, आज्ञापालन करते हैं। चाहे अन्य लोग इसका कुछ भी अर्थ क्यों न लगावें, पर हम तो यही कहेंगे कि जो व्यक्ति अपने जीवित पिता-माता आदि की सेवा नहीं करते, उल्टा उनको दुख पहुंचाते हैं, या उनका अपमान करते हैं, बाद में उनका पिण्डदान और श्राद्ध करना कोरा ढोंग है और उसका कोई परिणाम नहीं। क्योंकि अगर हमारे श्राद्ध का फल पितरों तक सूक्ष्म रूप से पहुंचता भी है तो वह तभी संभव है जब हम सच्ची भावना और एकाग्र चित्त से उस कार्य को करें। पर जो लोग जन्म भर अपने पिता-माता को हर तरह से कष्ट पहुंचाते रहे, उनको भला-बुरा कहते रहे, वे फिर किस प्रकार श्रद्धा और हार्दिक भावना से श्राद्ध आदि कर्म कर सकते हैं?
माता-पिता गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता की भावना जीवन भर धारण किये रहना आवश्यक है। यदि इन गुरुजनों का स्वर्गवास हो जाय तो भी मनुष्य की वह श्रद्धा स्थिर रहनी चाहिये। इस दृष्टि से मृत्यु के पश्चात् पितृ यज्ञों में मृत्यु की वर्ष तिथि के दिन, पर्व समारोहों पर श्राद्ध करने का श्रुति स्मृतियों में विधान पाया जाता है। श्रद्धा से श्राद्ध शब्द बना है। श्रद्धापूर्वक किये कार्य को श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह श्राद्ध कहलाता है। जीवित पितरों और गुरुजनों के लिए श्रद्धा प्रकट करने—श्राद्ध करने के लिए, उनकी अनेक प्रकार से सेवा-पूजा तथा संतुष्टि की जा सकती है परन्तु स्वर्गीय पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करने का। अपनी कृतज्ञता को प्रकट करने का कोई निमित्त बनाना पड़ता है। यह निमित्त है—श्रद्धा, मृत पितरों के लिए कृतज्ञता के इन भावों का स्थिर रहना हमारी संस्कृति की महानता को ही प्रकट करता है। जिनके सेवा सत्कार के लिये हिन्दुओं ने वर्ष में 15 दिन का समय प्रथक निकाल लिया है पितृ भक्ति का इससे उज्ज्वल आदेश और कहीं मिलना कठिन है।

                          परमपूज्य गुरुदेव
                  (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
(श्राद्ध विशेष)
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श्रद्धा तो हिन्दू धर्म का मेरु दण्ड है। हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों में आधे से अधिक श्राद्ध तत्त्व भरा हुआ है। सूर्य, चन्द्रमा ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी, अग्नि जल, कुंआ, तालाब नदी, मरघट, खेत, खलिहान, भोजन चक्की, चूल्हा, तलवार, कलम, जेवर, रुपया, घड़ा, पुस्तक, आदि निर्जीव पदार्थों की विवाह या अन्य संस्कारों में अथवा किन्हीं विशेष अवसरों पर पूजा होती है। यहां तक कि नाली या घूरे तक की पूजा होती है। तुलसी, पीपल, वट, आंवला आदि पेड़, पौधे तथा गौ, बैल, घोड़ा, हाथी, आदि पशु पूजे जाते हैं। इन पूजाओं में उन जड़ पदार्थों या पशुओं को कोई लाभ नहीं होता परन्तु पूजा करने वाले के मन में श्रद्धा एवं कृतज्ञता का भाव अवश्य उत्पन्न होता है। जिन जड़-चेतन पदार्थों से हमें लाभ मिलता है, उनके प्रति हमारी बुद्धि में उपकृत भाव होना चाहिये और उसे किसी न किसी रूप में प्रकट करना ही चाहिये। यह श्राद्ध ही तो है। मरे हुए व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म से कुछ लाभ है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि होता है, अवश्य होता है। संसार एक समुद्र के समान है जिसमें जल कणों की भांति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है जो व्यक्ति एक परमाणु। जीवित या मृत आत्मा इस विश्व में मौजूद है और अन्य समस्त आत्माओं से सम्बन्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार अत्याचार हो रहे हों तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है। जाड़े और गर्मी के मौसम में हर एक वस्तु ठण्डी और गर्म हो जाती है। छोटा सा यज्ञ करने पर भी उसकी दिव्य गन्ध व भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुंचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिये किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शान्तिमयी सद्भावना की लहरें पहुंचाता है। यह सूक्ष्म भाव तरंगें तृप्तिकारक और आनन्ददायक होती हैं। सद्भावना की तरंगें जीवित-मृत सभी को तृप्त करती हैं परन्तु अधिकांश भाग उन्हीं को पहुंचता है जिनके लिये वह श्राद्ध विशेष प्रकार से किया गया है।
स्थूल वस्तुएं एक स्थान से दूसरे स्थान तक देर में कठिनाई से पहुंचती हैं परन्तु सूक्ष्म तत्त्वों के सम्बन्ध में यह बात नहीं है। उनका आवागमन आसानी से हो जाता है। हवा, गर्मी, प्रकाश और शब्द आदि को बहुत दूरी पार करते हुए कुछ विलम्ब नहीं लगता। विचार और भाव इससे भी सूक्ष्म हैं। वह उस व्यक्ति के पास जा पहुंचते हैं जिसके लिए वह फेंके जायें। तर्पण का कर्मकाण्ड प्रत्यक्ष रूप से बुद्धिवादी व्यक्तियों के लिए कोई महत्त्व न रखता हो परन्तु उसकी महत्ता तो उसके पीछे काम कर रही भावना में है। भावना ही मनुष्य को असुर, पिशाच, राक्षस, शैतान या महापुरुष, ऋषि, देवता महात्मा बनाती है। इसी के द्वारा मनुष्य सुखी, स्वस्थ, पराक्रमी, यशस्वी तथा महान् बनते हैं और यही उन्हें दुःखी, रोगी दीन-दास, और तुच्छ बनाती हैं। मनुष्य और मनुष्य के बीच में जो जमीन आसमान का अन्तर दिखाई देता है, वह भावना का ही अन्तर है। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने अपने धार्मिक कर्म-काण्डों का माध्यम इसी महान् शक्ति को बनाया है।

                              परमपूज्य गुरुदेव
                     (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
(श्राद्ध विशेष)
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हिन्दू अपने पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता प्रकट करने और उनके प्रति अपनी भावनाओं को उत्तेजित करने के लिए वर्ष में पन्द्रह दिन का समय देते हैं। श्राद्ध को केवल रूढ़िमात्र से पूरा न कर लेना चाहिए वरन् पितरों के द्वारा जो हमारे ऊपर उपकार हुए हैं उनका स्मरण करके, उनके प्रति अपनी श्रद्धा और भावना की वृद्धि करनी चाहिये। साथ-साथ अपने जीवित पितरों को भी न भूलना चाहिये। उनके प्रति भी आदर, सत्कार और सम्मान के पवित्र भाव रखने चाहियें। श्राद्ध में ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, पात्र आदि का दान दिया जाता है। इसमें ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिस व्यक्ति विशेष को आप जो वस्तुएं दान रूप में दें रहे हैं, वह शीघ्र ही उनके काम आने वाली हों, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली हों। ऐसा न हो कि आप रुपया खर्च करके दान दें और वह वस्तुएं उनके घर पर लम्बे समय तक बिना काम के पड़ी रहें।
यह बात युक्तिसंगत नहीं दीखती कि यदि किसी वृद्ध या वृद्धा की मृत्यु हो तो वृद्ध या वृद्धाओं को ही भोजन कराया जाय या दान दिया जाय या विधवा स्वर्गवास होने पर विधवाओं को ही दान दिया जाय। आवश्यकता को देख कर ही दान की महत्ता और लाभ सिद्ध होता है। भोजन कराते समय निर्धन विद्यार्थियों को फीस आदि के लिए भी स्थान रखना चाहिए। पितरों के लिये दिये गये दान द्वारा उनके जीवन का उत्थान होगा तो उनकी अन्तरात्मा से आपके पितरों के प्रति शान्तिदायक सद्प्रेरणाएं निकलेंगी। इसी प्रकार से सत्कार्यों में योग देने के लिए दान के अन्य उपाय सोचे जा सकते हैं।
तर्पण तो श्राद्ध में किया ही जाता है। इसके साथ-साथ पितरों की शान्ति के लिये ‘‘सूक्त संहिता’’ नामक पुस्तक में वर्णन पितृ सूक्त के मन्त्रों से हवन करना चाहिये क्योंकि हिन्दू धर्म में कोई भी शुभ या अशुभ कार्य हवन के बिना पूर्ण नहीं माना जाता। यह पुस्तक अखंड ज्योति प्रेस ने भी प्रकाशित कर दी है।

पितरों को सच्ची श्रद्धा दी जाएगी, उन्हें तृप्त रखा जाएगा, तो वे निश्चय ही शक्ति, प्रकाश, मार्ग दर्शन प्रेरणा, सहयोग एवं भावात्मक अनुदान देंगे।

                                     परमपूज्य गुरुदेव
                           (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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