गुरुगीता-40
भगवान बुध्द के एक शिष्य थे जिनका नाम था महाकाश्यप । उनके भी कई शिष्य थे । उनमें एक शिष्य एक दिन अपने गुरु को कहने लगा ‘गुरुजी ! अब मेरी इच्छा है मैं कहीं अलग जा के साधना करूँ क्योंकि आपके पास भीड़ बहुत होती है । लोगों से बातें करने में मिलने-जुलने में सारा दिन मेरा ऐसे ही जाता है सेवा करने में । मेरे को साधना करने का समय नहीं मिलता । मैं कहीं जाऊँ एकांत में साधना करूँ । ये मूल में भूल है ।
अब गुरु को छोड़कर कहीं और जाके मैं साधना करूँ ऐसे उसके मन में विचार आया । गुरु ने समझाया पर माना नहीं राग था शरीर में, राग था मन में । पाँच जगह राग होता है गीता में बताया है । शरीर में राग, मन में राग, अपनी मान्यताओं में राग (मैं जो सोच रहा हूँ वही ठीक है)……. तुमको नहीं पता ।
वह चला गया । अनुराग नहीं हुआ था गुरु में।अभी राग था इन्द्रियों में, शरीर में, मन में और बुध्दि में (गीता के तीसरे अध्याय के श्लोक 34 वें) में ये बात आती है । कि इतनी जगह राग हो जाता है बँध जाता है आदमी । अलग रहता था तो कुछ लोग आते-जाते थे उसके पास भी । एक लड़की से उसका परिचय हुआ । इन्द्रियों में राग था इसलिए परिचय वह भी बढ़ाता गया अपनी तरफ से और परिणाम ये आया कि दोनों ने शादी करने का इरादा पक्का कर लिया । कर ली शादी । गया माँ-बाप के पास कि मैंने इस लड़की से शादी कर ली है। माँ-बाप ने कहा ः ”भाग जा हमारे घर से कोई जरूरत नहीं इस घर में । खबरदार ! जो दुबारा पैर रखा तो” क्यों ? माँ-बाप ने कहा हमने तुझे इतने बड़े संत के पास रखा फिर भी अभागे तू ये लव मेरिज करके आया । धिक्कार है तेरे को, इससे तो माँ बोली कि मेरे पेट से पत्थर आया होता तो अच्छा था । तू कैसा अभागा गुरु को नहीं पहचाना तूने । गुरु को छोड़कर दूसरी जगह साधना करने गया था। आया बड़ा साधना करनेवाला ये की साधना तूने ? चला जा हमारे घर से । निकाल दिया । अब कमाना उसको आता नहीं था चोरी करने लग गया । पैसा तो चाहिए तो चोरी करने लगा । कहाँ तो गुरु के पास साधना करता था और कहाँ अब चोरी करने लग गया ! सोचा भी नहीं होगा उसने कि मैं मेरे गुरु से दूर जाऊँगा तो यह दिन भी मुझे देखना पड़ सकता है । हे भगवान ! सबको सद्बुध्दि दे कि किसी के जीवन में ऐसा दिन न आये कि वह अपने सद्गुरु से दूर हो जाये ।
सोचा भी न था उसने कि चोरी करनी पड़ेगी । अब तो बिन चोरी के काम चले न । ऐसी हालत हो गयी । एक दिन राजा के यहाँ चोरी की । पकड़ा गया । राजा ने और भी शिकायतें उसके बारे में सुनी हुई थीं मृत्युदंड की सजा सुना दी । जंजीरों से बाँधकर जल्लाद उसको ले जा रहे थे मारने के लिए । कहाँ तो गुरु के पास रहता था ध्यान करता था, साधना करता था और कहाँ ये मृत्युदंड की सजा !
उसको मृत्युदंड की सजा हो गयी । नंगी तलवारें लेकर जा रहे हैं उसको अमुक जगह ले जाकर गर्दन काट देंगे । रो रहा था बेचारा अपने भाग्य को कोस रहा था कि हाय रे ! हाय मेरे भाग्य में क्या ऐसा ही लिखा था क्या ? परंतु भाग्य का निर्माता वह स्वयं ही था उसने इस दिशा में कदम क्यों उठाये ? गुरु समझा रहे थे तो गुरु की कल्याणकारी बात क्यों नहीं मानी ?
जल्लाद लिये जा रहे हैं उसको । थोड़ी देर में उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा पर कुछ उसकी पुण्यायी थी जो पहले गुरु के पास रहा था, सेवा की थी, भक्ति की थी सामने से उसके गुरुदेव महाकाश्यप भिक्षा का समय हुआ था भिक्षा के लिए निकले थे। नजर पड़ी अपने शिष्य पर पहचान लिया । पर वो नहीं पहचान पाया भूल गया था । भूल गया था तभी इस पाप में पड़ा अगर नहीं भूला होता तो इसमें नहीं उलझता भूल गया था ।
गुरु की नजर पड़ी । गुरु ने देखा अरे मेरा शिष्य की ये हालत ! गुरु पास आये, खड़े रहे तो जल्लाद भी गुरु का तेज देखके रुक गये। कुछ बोल न पाये गुरुदेव ने एक नजर डाली अपने शिष्य पर । कहा ः ”बेटे ! पहचाना तूने मुझे ?” उसने अपनी ऑंख के ऑंसू पोंछे निकट से देखा पहचान लिया गिर पड़ा उनके चरणों में गुरुदेव में आपसे दूर गया मेरी कैसी दुर्गति हो गयी आपसे दूर जाने में । अब तो गुरुदेव मुझे मृत्यु की सजा मिली है । सारी बात उसने बता दी । तब गुरु ने ये नहीं कहा कि देखा मेरे से दूर जाने का परिणाम तुझे कैसा मिला ! कोसा नहीं उसको गुरु ने कहा ः ”बेटे! अब इसको याद मत कर । अतीत में मत उलझ और भविष्य की कोई कल्पना मत कर । वर्तमान को सँभाल ले । ध्यान में डूब फिर से ।” गुरु ने अपनी कृपा की नजर डाली । वह गहरे ध्यान में चला गया । थोड़ी देर में उसकी ऑंख खुली । जल्लादों ने उसके गुरु को कहा कि अब समय हो रहा है । बोले ठीक है । ले जाने लगे । गुरु ने भी एक दृष्टि डाल दी उन जल्लादों पर भी । कोई भी गुरु अपने सामने अपने शिष्य को मौत के मुँह में जाता हुआ कैसे देख सकते हैं ?
महाकाश्यप अपने शिष्य को अपने सामने मरता कैसे देख सकते थे । जल्लादों ने ज्यों ही तलवार उठायी और उसकी गर्दन पर वार करना चाहा वह भी ध्यान की गहराइयों में चला गया था । गुरु ने फिर उस पर कृपादृष्टि डाल के शक्तिपात कर दिया था । जल्लादों की तलवार उस तक आते-आते हाथ ही रुक जाते, आगे बढ़ते ही नहीं, हाथ कांपने लग जाते क्योंकि वह ध्यान में जो चला गया था । अब ध्यान के द्वारा भगवान राजी होते हैं । काफी देर उन्होंने कोशिश की पर नहीं मार पाये तो राजा को इस बात की सूचना दी । राजा आया सारी बात पता चली उनके गुरु से बातचीत की और गुरु ने कहा ठीक है मेरे इस शिष्य को आप एक अवसर दिया जाये । भले इसने जीवन में बुरे काम किये हैं पर फिर भी है तो आदमी । जब बुरा किया था तब बुरा था अभी वो बुरा नहीं है । अभी इसको अपने किये का प्रायश्चित हो रहा है । पहले भी बुरा नहीं था मेरे पास रहता था तब बीच में थोड़ा समय ये मुझे भूल गया बिचारा चलो छोड़ दो गुरु के कहने पर उसको मृत्युदंड की सजा माफ हो गयी । उसने फिर से नये जीवन की शुरुआत कर दी और गुरु के कहे अनुसार अपना जीवन बनाकर अपना कल्याण कर लिया ।
ऐसा केवल गुरु ही कर सकते हैं !!
गुरुगीता पाठ
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तस्मात् परतरं नास्ति नेति नेतीति वै श्रुति:।
कर्मणा मनसा वाचा सर्वदाssराधयेद् गुरुम् ।।42।।
अर्थ
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वेदों ने "यह नहीं है, यह नहीं है" बोलकर निश्चय किया है कि गुरु की अपेक्षा श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है।गुरु आदिष्ट कर्मों का सफल अनुष्ठान करके एवं वाक्य द्वारा उनका नाम
कीर्तन और स्तवादि पाठ करके और मन द्वारा उनका परम
चिन्मय स्वरूप चिन्तन करके सब समय श्री गुरुदेव आराधना करनी चाहिए।कार्य, मन और वाक्य उनकी सेवा
के अतिरिक्त एक क्षण भी और कुछ नहीं करेगा ।।42।।
42.
The vedas have come to a conclusion through a process of exclusion -"It is not this, It is not this" that there is nothing more benedictory as compared to the Master. One should successfully carryout the ordinary duties as preached by the Master and keep on reciting His name and His stotra (Hymns)all the time and thus carry out the worship. The service to the Master should be performed without wasting a moment and nothing else should be done except this.
👣🙏
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