सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-25

जिन लोगों ने संकल्प लिया था वे सभी भाई लगातार उस सिपाही भाई के पिताजी के स्वास्थ्य लाभ के लिये जप कर रहे थे तथा हवन में विशेष आहुतियां भी दे रहे थे। आपको आश्चर्य होगा कि ये यज्ञ "कुण्डीय यज्ञ"नहीं था, यह भाव यज्ञ था क्यों कि रोज़ यज्ञ कैसे संभव होता  ? न तो इज़ाजत मिलती, ना ही उन लोगों के पास इतना समय होता था। लकड़ी का काम, दरियॉ व कपड़े बनाना,आटा चक्की, खाना बनाना, आई.टी.आई. इत्यादि बहुत सारे काम थे,जो उन्हें करने होते थे। कुछ बच्चे पढ़ाई भी करते थे इग्नू के द्वारा। बस एक ही तरीका था कि जप माला जेब में रखें और जब समय मिले तब वहीं बैठकर जप करें, नहीं तो चलते-फिरते करें और शाम 6 बजे बैरकें बन्द हो जाने के बाद अधूरी माला पूरी करके सभी ध्यान मुद्रा में बैठकर स्थूल यज्ञ की तरह भावनात्मक रूप से यज्ञ करें।सभी के पास देवस्थापना की तस्वीरें थीं जिन्हें उन्होंने अपने-अपने बिस्तर के पास लगा रखा था।बहुत ही ईमानदारी से वे लोग इस अनुष्ठान  को कर रहे थे।कुछ बुद्धिजीवी लोग इसकी आलोचना भी कर सकते हैं कि ये कैसा यज्ञ और ये कैसा जप। जब कि देश, काल, परिस्थितियों के हिसाब से गुरुदेव क्या करा रहे थे यह शायद हमारी समझ से भी परे था।बसइतना मालूम था कि मन,वचन,और कर्म से हम चल नहीं रहे थे, चलाया जा रहा था।जो वाणी से निकल गया,बच्चे उसे पूरा करने में जुट जाते।कभी-कभी ऐसा महसूस होता था जैसे अन्तरिक्ष से एक बहुत बड़े तारों का गुच्छा कारागार परिसर में आ गया हो और उसके एक-एक तार ने हम सभी को उसमें लपेट रखा हो। बहुत बार जो बात हम सोच कर जाते अन्दर पहूँचते ही वही बात बन्दी भाई बोलना शुरू कर देते।हम सब आपस में एक-दूसरे को देखने लगते कि ये क्या हुआ  ? बाद में समझ आता कि
अन्तरिक्ष का तारों का गुच्छा जिसके हाथ में है, यह कमाल भी उन्हीं का है। रात में जब ध्यान यज्ञ वे लोग करते तो कुछ लोगों को आनन्ददायक अनुभूतियॉ होतीं।इन्हीं में से एक भाई को गायत्री मन्त्र की आहुतियों के बाद जब महामृत्युंजय की आहुतियां देता तो नित नये दर्शनों का आनन्द आने लगता और नतीजा यह होता कि उसका यज्ञ रात भर चलता रहता, कब सुबह हुई पता ही नहीं चला, जब सुबह 6 बजे बैरक खुलती तब वह बाहर निकलता। नतीजतन वह फैक्ट्री में काम के बीच में बैठे-बैठे नींद निकालता। इसके कारण प्रशासन से उसे कई बार फटकार भी लगाई, लेकिन वह यह बात किसी को बता भी नहीं सकता था क्यों कि घायल की गति घायल जाने ।
                                       क्रमशः!
                                'गुरुकॄपा केवलम्'
                           "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                       👣🙏

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