अमृतवाणी-133/134/135

अमृतवाणी
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इस समय जिसमें आप हमारी बात सुन रहे हैं, ऐसा समय है, जिसको सामान्य नहीं कह सकते।इसे असामान्य ही कहा जायेगा।वैसे आपका सूरज सबेरे निकलता है, शाम को अस्त हो जाता है।कुँये से पानी निकालते हैं, चक्की से आटा पीसते हैं, चौके से खाना खा लेते हैं। समय मामूली-सा मालूम पड़ता है, लेकिन हम और आप विचारपूर्वक अगर इसका अन्दाजा लगाना चाहें तो मालूम पड़ेगा कि यह बहुत भयंकर समय है।इस भयंकर समय में तूफान भले ही न आते हों, आपके ऊपर घनघोर बारिश भले ही न होती हो,लेकिन संसार की निगाह से और ज़रा लम्बी दृष्टि फेंककर देखेंगे तो आपको यह मालूम पड़ेगा कि यह बहुत ही असाधारण समय है।जो सॉस आप लेते हैं उससे आपके भीतर ज़हर चला जा रहा है और आपकी जिन्दगी को रोज़ कम कर रहा है।

                                    परमपूज्य गुरुदेव
                            (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

इस भयंकर समय में प्रत्येक आदमी के ऊपर मुसीबत छाई हुई है।थोड़े आदमियों के ऊपर नहीं, बहुत आदमियों के ऊपर, सारे संसार के ऊपर।पानी गन्दा हुआ जा रहा है।विकिरण बढ़ता जा रहा है।इससे बच्चे अपाहिज, लँगड़े-लूले पैदा हो रहे हैं।जनसंख्या की दृष्टि से आदमी किस कदर बढ़ता हुआ चला जा रहा है और खाने के लिए सामान कम पड़ता चला जा रहा है।आपने देखा, सुना ? आपकी इतनी उमर हो गई ? जिस भाव से आपको गेहूँ मिलता है, चावल, घी मिलता है, क्या आपने इससे पहले कभी सुना था ? नहीं कभी नहीं सुना था।यह मँहगाई बढ़ रही है।अभी और बढ़ेगी।मुझे घटने की कोई सूरत नज़र नहीं आती। वस्तुतः यह मुसीबत का समय है और आदमी पर मुसीबतें बढ़ती ही चली जा रही है और बढ़ेंगी अभी।
यह ऐसा समय है जिसमें किसी को किसी पर विश्वास नहीं रह गया है।आतंक और आशंकाओं से वातावरण चारों ओर से घिरा हुआ है।सड़क पर जब आप निकलते हैं तो मालूम नहीं कि आपके साथ पड़ोस में चलने वाला आपके चाकू
भोंककर कब आपकी सम्पत्ति छीन लेगा, इसका क्या विश्वास है।

                                परमपूज्य गुरुदेव
                       (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

इनसान का चाल-चलन,इनसान का विचार इतना गन्दा-घटिया हो गया है कि यह स्थिति अगर बनी रही तो कोई किसी पर विश्वास नहीं करेगा, न भाई-भाई पर विश्वास करेगा ,न स्त्री पुरुष पर विश्वास करेगी, न पुरुष स्त्री पर विश्वास करेगा, ऐसा गन्दा, ऐसा वाहियात समय है यह। यह  समय इसलिए भी घटिया और वाहियात है कि नेचर हमसे आप सबसे नाराज हो गई है।जब उसकी मौज आती है तो अन्धाधुन्ध पानी बरसा देती है और जब मूड आता है तो सूखा नज़र आता है।कहीं मौसम का ठिकाना नहीं कि मौसम पर पानी बरसेगा कि नहीं ,ठण्ड के समय ठण्ड ही पड़ेगी कि गर्मी पड़ेगी, कोई नहीं कह सकता  ? बाढ़ कब आ जाये कोई ठिकाना नहीं  ? प्रकृति हम सबसे बिलकुल नाराज हो गई है, इसलिए उसने काम करना बन्द कर दिया है ।
ऐसे भयंकर समय में आपके ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं है  ? क्या आपके कोई कर्तव्य नहीं है  ? क्या आपके अन्दर भावनायें नहीं हैं  ? क्या आपका ह्रदय पत्थर और लोहे का हो गया है  ? नहीं, मेरा ख़याल है कि सब आदमियों का ऐसा नहीं हुआ होगा ।ज्यादातर लोगों का तो ऐसा ही हुआ है कि वे घटते-घटते जानवर की तरीके से बनते चले जा रहे हैं ।

                                 परमपूज्य गुरुदेव
                        (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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