अमृतवाणी-164/165/166
श्रद्धा तो हिन्दू धर्म का मेरु दण्ड है। हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों में आधे से अधिक श्राद्ध तत्त्व भरा हुआ है। सूर्य, चन्द्रमा ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी, अग्नि जल, कुंआ, तालाब नदी, मरघट, खेत, खलिहान, भोजन चक्की, चूल्हा, तलवार, कलम, जेवर, रुपया, घड़ा, पुस्तक, आदि निर्जीव पदार्थों की विवाह या अन्य संस्कारों में अथवा किन्हीं विशेष अवसरों पर पूजा होती है। यहां तक कि नाली या घूरे तक की पूजा होती है। तुलसी, पीपल, वट, आंवला आदि पेड़, पौधे तथा गौ, बैल, घोड़ा, हाथी, आदि पशु पूजे जाते हैं। इन पूजाओं में उन जड़ पदार्थों या पशुओं को कोई लाभ नहीं होता परन्तु पूजा करने वाले के मन में श्रद्धा एवं कृतज्ञता का भाव अवश्य उत्पन्न होता है। जिन जड़-चेतन पदार्थों से हमें लाभ मिलता है, उनके प्रति हमारी बुद्धि में उपकृत भाव होना चाहिये और उसे किसी न किसी रूप में प्रकट करना ही चाहिये। यह श्राद्ध ही तो है। मरे हुए व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म से कुछ लाभ है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि होता है, अवश्य होता है। संसार एक समुद्र के समान है जिसमें जल कणों की भांति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है जो व्यक्ति एक परमाणु। जीवित या मृत आत्मा इस विश्व में मौजूद है और अन्य समस्त आत्माओं से सम्बन्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार अत्याचार हो रहे हों तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है। जाड़े और गर्मी के मौसम में हर एक वस्तु ठण्डी और गर्म हो जाती है। छोटा सा यज्ञ करने पर भी उसकी दिव्य गन्ध व भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुंचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिये किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शान्तिमयी सद्भावना की लहरें पहुंचाता है। यह सूक्ष्म भाव तरंगें तृप्तिकारक और आनन्ददायक होती हैं। सद्भावना की तरंगें जीवित-मृत सभी को तृप्त करती हैं परन्तु अधिकांश भाग उन्हीं को पहुंचता है जिनके लिये वह श्राद्ध विशेष प्रकार से किया गया है।
स्थूल वस्तुएं एक स्थान से दूसरे स्थान तक देर में कठिनाई से पहुंचती हैं परन्तु सूक्ष्म तत्त्वों के सम्बन्ध में यह बात नहीं है। उनका आवागमन आसानी से हो जाता है। हवा, गर्मी, प्रकाश और शब्द आदि को बहुत दूरी पार करते हुए कुछ विलम्ब नहीं लगता। विचार और भाव इससे भी सूक्ष्म हैं। वह उस व्यक्ति के पास जा पहुंचते हैं जिसके लिए वह फेंके जायें। तर्पण का कर्मकाण्ड प्रत्यक्ष रूप से बुद्धिवादी व्यक्तियों के लिए कोई महत्त्व न रखता हो परन्तु उसकी महत्ता तो उसके पीछे काम कर रही भावना में है। भावना ही मनुष्य को असुर, पिशाच, राक्षस, शैतान या महापुरुष, ऋषि, देवता महात्मा बनाती है। इसी के द्वारा मनुष्य सुखी, स्वस्थ, पराक्रमी, यशस्वी तथा महान् बनते हैं और यही उन्हें दुःखी, रोगी दीन-दास, और तुच्छ बनाती हैं। मनुष्य और मनुष्य के बीच में जो जमीन आसमान का अन्तर दिखाई देता है, वह भावना का ही अन्तर है। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने अपने धार्मिक कर्म-काण्डों का माध्यम इसी महान् शक्ति को बनाया है।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
सच्ची श्रद्धा और भक्ति भावना के साथ पितरों का स्मरण किया जाय तो वे अशरीरी किन्तु अति समर्थ सत्ताएं निश्चय ही सत्प्रयोजनों में मदद के लिए आगे आ जाती हैं। इस सन्दर्भ में द्वितीय महायुद्ध की एक घटना विलक्षण प्रमाण है। इस युद्ध-श्रृंखला में मोन्स लड़ाई का यह प्रामाणिक और सुरक्षित युद्ध दस्तावेज विद्यमान है—
इस युद्ध में ब्रिटिश सेना बुरी तरह मारी-काटी गई। कुल 500 सैनिक शेष रहे थे। जर्मन सेनायें उन्हें भी काट डालने की तैयारी में थीं। उनकी संख्या उस समय दस हजार थी। ब्रिटिश सैनिकों में से एक सिपाही ने कभी सेंट जार्ज की तस्वीर एक होटल में देखी थी। यह तस्वीर एक प्लेट में कढ़ी थी और उसके नीचे लिखा था—‘‘सेंट जार्ज इंग्लैण्ड की सहायता करने को उपस्थित हों’’ वह कभी इंग्लैण्ड के प्रख्यात सेनापति थे और अपने कई हजार सैनिकों के साथ युद्ध में मारे गये थे। उनकी याद आते ही सैनिकों ने अपनी सम्पूर्ण भावना और आत्म-शक्ति से सेंट जार्ज का स्मरण किया और दूसरे क्षण स्थिति कुछ और ही थी। बिजली सी कौंधी और 500 सैनिकों के पीछे कई हजार श्वेत वस्त्रधारी सैनिकों की-सी आभा दिखाई देने लगी। दूसरे ही क्षण दस हजार सेना मैदान में मरी पड़ी थी। रहस्य तो यह था कि किसी भी सैनिक के शरीर में किसी भी अस्त्र का कोई चोट या घाव तक नहीं था। इस घटना ने इंग्लैण्ड में एक बार तहलका मचा दिया कि सचमुच मृत्यु के उपरान्त आत्मा का अस्तित्व नष्ट नहीं होता वरन् रूपान्तर होता है और यह आत्मायें अदृश्य होते हुए भी स्थूल सहायतायें पहुंचा सकती हैं।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
उदात्त आत्माएं पितर रूप में समस्त सत्पात्रों की सहायता के लिए सदैव प्रस्तुत रहती हैं। उनकी आत्मीयता की परिधि अति विस्तृत होती है। ये पितर सत्ताएं पात्रता देखती हैं, परिचय की पृष्ठभूमि नहीं। क्योंकि सत्पात्र का परिचय उन्हें तो मिल ही जाता है और दूसरे को अपना परिचय देने की उनकी कोई निजी आकांक्षा नहीं होती। वे तो कल्याण-पथ में नियोजित कर देना ही अपना कर्तव्य मानती हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी को एक पितर-सत्ता ने ही श्री हनुमान और भगवान् राम के दिव्य-दर्शनों की विधि सुनाई थी और उन्हें एक अनाथ भावनाशील बालक से एक भक्त महाकवि और सन्त बन जाने में विशेष भूमिका निभाई थी।
थियोसॉफिकल सोसाइटी की जन्मदात्री मैडम ब्लैवटस्की को चार वर्ष की आयु से ही पितर आत्माओं का सहयोग सान्निध्य प्राप्त होने लगा। वे अचानक आवेश में आकर ऐसी तथ्यपूर्ण बातें कहती जिन्हें कह सकना किन्हीं विशेषज्ञों के लिए ही सम्भव था। परिवार के लोग पहले तो उन्हें विक्षिप्त समझने लगे, पर जब उनके साथ देवात्माओं के प्रत्यक्ष सम्पर्क के प्रमाण देखने लगे तो उनकी विशेषता स्वीकार करनी पड़ी।
एक बार एक प्रेतात्मा ने उसके शरीर के कपड़े ही मजाक में बिस्तर के साथ सीं दिये। दूसरे लोगों ने जब वह सिलाई उधेड़ी तभी वे उठ सकीं। एक बार कर्नल हैनरी आल्काट उनसे मिलने आये तो वे सिलाई की मशीन से तौलिये सीं रही थीं और कुर्सी पर पैर पटक रही थी। आल्काट ने पैर पीटने का कारण पूछा तो उनने कहा एक छोटा प्रेतात्मा बार-बार मेरे कपड़े खींचता है और कहता कि मुझे भी कुछ काम दे दो। कर्नल ने उसी मजाक में उत्तर दिया कि उसे कपड़े सीने का काम क्यों नहीं दे देतीं? ब्लैवटस्की ने कपड़े समेट कर अलमारी में रख दिये और उनसे बातें करने लगी। बात समाप्त होने पर जब अलमारी खोली गई तो सभी बिना सिले कपड़े सिये हुए तैयार रखे थे।
मैडम ब्लैवेटस्की के कथनानुसार उनकी सहकारी मण्डली में सात-प्रेत थे, जो समय-समय पर उन्हें उपयोगी परामर्श और मुक्त हस्त सहायता करते थे। कर्नल आल्काट अमेरिका में अपने समय के अत्यन्त सम्मानित नागरिक और प्रसिद्ध वकील थे, उन्होंने मैडम से प्रभावित होकर उनके अध्यात्म कार्य में सदा भरपूर सहयोग दिया। ब्लैवेटस्की एक बार अपने सम्बन्धियों से मिलने के लिए रूस गई। वहां उसके भाई के कान में भी उनकी दिव्य शक्ति की चर्चा पहुंची। उसने इतना ही कहा कि मैं मात्र बहिन होने के कारण उनकी बातों पर विश्वास नहीं कर सकता। मैडम ने अपने भाई को एक हलकी-सी मेज उठाकर लाने के लिए कहा—वह ले आया। अब उन्होंने फिर कहा इसे जहां से लाये हो वहीं रख आओ। भाई ने भरपूर जोर लगाया पर वह इतनी भारी हो गई कि किसी प्रकार न उठ सकी। इस पर घर के अन्य लोग आ गये और वे सब मिलकर उठाने लगे इतने पर भी वह उठी नहीं। जब सब लोग थक कर हार गये तो मैडम ने मुस्करा कर उसे यथावत् कर दिया और मेज फिर पहले की तरह हलकी हो गई। उसे उठा कर आसानी से जहां का तहां रख दिया गया।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
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