गुरुगीता-8

लाहिड़ीमहाशय को प्यार से ‘‘आनन्दमग्न बाबू’’कहने वाले अंग्रेज ऑफिस सुपरिंटेन्डेन्ट के ध्यान में सबसेपहले यह बात आयी कि उनके कर्मचारी में कोर्इ अज्ञात श्रेष्ठपरिवर्तन आ रहा हैं।
‘‘सर, आप दु:खी लगते हैं। क्या बात है?’’ एक दिनसुबह लाहिड़ी महाशय ने अपने सुपरिंटेन्डेन्ट से पूछा।
‘‘इंग्लैण्ड में मेरी पत्नी गम्भीर रूप से बीमार है। मुझेबहुत चिंता हो रही है।’’
‘‘मैं आपको उनका कुछ समाचार ला देता हूँ।’’लाहिड़ी महाशय वहाँ से चले गये और एक एकान्त स्थान मेंजाकर कुछ देरे बैठे रहे। जब वापस आये तो धीरज देने केअंदाज में मुस्करा रहे थे।
‘‘आपकी पत्नी की हालत सुधर रही है; अभी वेआपको पत्र लिख रही हैं।’’ सर्वज्ञ योगीवर ने पत्र के कुछअंश भी सुना दिये।
‘‘आनन्दमग्न बाबू! उतना तो मैं पहले ही जान गयाहूँ, कि आप साधारण मनुष्य नहीं हैं। फिर भी मुझे विश्वासनहीं हो पा रहा है कि आप अपनी इच्छा मात्र से ही देश औरकाल की सीमाओं को मिटा सकते हैं।’’
अन्तत: वह पत्र आ पहुँचा। देखकर सुपरिंटेन्डेन्टचकित रह गया कि पत्र में न केवल उसकी पत्नी के अच्छीहोने का शुभ समाचार था, बल्कि उन्हीं शब्दों में वह वाक्यभी थे जो महान् गुरु ने कर्इ सप्ताह पूर्व कह सुनाये थे।
कुछ महीनों बाद पत्नी भी भारत आ गयी। जबलाहिड़ी महाशय से मुलाकात हुर्इ तो वह श्रद्धा और आदर केसाथ उन्हें देखती ही रही। फिर बोली: ’’सर, महीनों पहलेलंदन में अपनी रुग्णशय्या के पास तेजस्वी प्रकाश में मैंनेआपको ही देखा था। उसी क्षण मैं पूर्ण स्वस्थ हो गयी! औरथोड़े ही दिन बाद भारत की लम्बी समुद्र-यात्रा करने में समर्थहो गयी।’’
दिन प्रति दिन महान् गुरु एक-दो साधकों को क्रियायोग की दीक्षा देते थे। अपने इन आध्यात्मिक कर्त्तव्यों एवंव्यावसायिक तथा पारिवारिक जीवन के उत्तरदायित्वों केअलावा वे शिक्षा के क्षेत्र में भी सोत्साह हिस्सा लेते थे।उन्होंने कर्इ घरों में छोटी-छोटी पाठशालाएँ शुरू करवा दी थींऔर काशी के बंगाली टोला मुहल्ले में एक बड़े हाइस्कूल केविकास में सक्रिय योगदान दिया था। साप्ताहिक सभाओं में,जो बाद में ‘‘गीता-सभा’’ के नाम से प्रतिष्ठित हुर्इ, महान गुरुअनेक जिज्ञासुओं को शास्त्रों का अर्थ समझाते थे।
इन बहुमुखी गतिविधियों द्वारा लाहिड़ी महाशय उससामान्य प्रतिवाद का उत्तर देने की चे”टा कर रहे थे:‘‘व्यावसायिक और सामाजिक कर्त्तव्यों को निभाते-निभातेध्यान-धारणा का समय ही कहाँ बचता है?’’ इस महानगृहस्थ-योगी गुरु का पूर्ण संतुतिल जीवन हजारों नर-नारियोंके लिये प्रेरणा का स्त्रोत बना। केवल साधारण-सा वेतन पातेहुए भी, किफायती खर्च करते हुए ये आड़म्बरहीन गुरु,जिनके पास कोर्इ भी पहुँच सकता था, अत्यंत स्वाभाविकतरीके से सुखपूर्वक संयमित सांसारिक जीवन व्यतीत कर रहेथे।
साक्षात परमात्मा के आसन पर विराजमान होते हुएभी लाहिड़ी महाशय बिना किसी भेदभाव के सभी लोगों काआदर करते थे। जब उनके भक्त उन्हें प्रणाम करते, तो वे भीउत्तर में उन्हें नमस्कार करते। गुरु के पाँव छूने की प्राचीनप्रथा होते हुए भी वे स्वयं ही शिशु सुलभ विन्रमता के साथदूसरों के पाँव छू लेते थे, पर दूसरों को कभी अपने पाँव नहीं छूने देते थे ।
गुरुगीता पाठ
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सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरो: पादसेवनात् ।
सर्वतीर्थावगाहानां फलं प्राप्नोति निश्चितम् ।।10।।
अन्वयः-
श्री गुरो:- श्री गुरुदेव की, पादसेवनात्  -चरणसेवा से,
सर्वपापविशुद्धात्मा  -  सर्वपापरहित चित्त, सन्  - होकर,
निश्चितम्  - निश्चय, सर्वतीर्थावगाहानां  - सब तीर्थों में स्नान का,फलम्  -फल, प्राप्नोति  - प्राप्त होता है ।।10।।
अर्थ-
मनुष्य श्री गुरुदेव की चरण सेवा से ही सर्वपापरहित-चित्त होकर निश्चय ही सब तीर्थ का स्नान फल लाभ करता है ।।10।।
10--
An individual by rendering service unto tha lotus feet of the Master can obtain a
Pure' it devoid of all sins and thus derive
definitely tha benediction of bathing at holy places without having gone there.

                                     👣🙏

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