अमृतवाणी-115/116/117

अमृतवाणी
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आजकल कर्मकांडों और पूजा के नाम पर लकीर पिटती है।आदमी ने लकीर पीटने के पीछे,कर्मकांडों के पीछे जो दिशाधारायें रहनी चाहिये थीं और रहतीं थीं,उन्हें न जाने क्यों भुला दिया  है ? उनसे महरूम और वंचित रह गए।
चंदपूजा से  आदमी को न जाने कैसे संतोष हो जाता है।
जैसे आचमनम् समर्पयामि,अर्घ्यम् समर्पयामि,स्नानम् समर्पयामि,एक चम्मच जल के पीछे छिपी प्रेरणा और
दिशाधारा समझिए।वह ये कि आपके शरीर में से जो पसीना निकलता है अर्थात जो श्रम आपकी मेहनत और मशक्कत है उसे आप भगवान के लिए लगाईये।वह लोकहित के लिए हो,उसी से आप स्नान करा सकते हैं। ये अक्षत, और नैवेद्य कहाँ हैं दिखाना ज़रा  ? शक्कर की गोलियां नहीं,भगवान का नैवेद्य है-हमारे श्रमदान के साथ-साथ में हमारा अंशदान।

                              परमपूज्य गुरुदेव
                     (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी -115
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यज्ञोपवीत जो हमको ये सिखाता है कि आदमी को हैवान का चोला छोड़ना और इन्सान की जिंदगी में प्रवेश करना चाहिए।आदमी को उदार और उदात्त बनना चाहिये।यही शिक्षण है।सारे के सारे शिक्षण को आपने देखा ?हमने कर्मकांड कराये,यज्ञोपवीत पहनाया और आपको याद दिलाया कि आपके जीवन का मक़सद,आपके जीवन का लक्ष्य क्या है?इन्सान के कलेवर में रहने वाले शैतान को ठोकर मार कर भगा दीजिए और जिस भगवान के निवास करने की पूरी-पूरी गुंजाइश है,उसे स्थापित कर लीजिये ।यही है जीवन का लक्ष्य,इसी को दूसरा जन्म कहते हैं ।जनेऊ पहनाते समय,यज्ञोपवीत धारण करते समय यही शिक्षायें दी जाती हैं और यही दी जानी चाहिए ।इसी के लिए आपको दो काम करने पड़े थे-एक तो दस स्नान करने पड़े और दूसरा हेमाद्रि संकल्प करना पड़ा ।यज्ञोपवीत करते समय,श्रावणी पर्व मनाते समय विशेष उपासना की प्रक्रिया को पूरा करते समय में ये दो आधार
बहुत आवश्यक हैं।

                                  परमपूज्य गुरुदेव
                         (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी -116
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ॠषि का अर्थ--
           वे व्यक्ति जो प्रभावशाली प्रतिभाओं के रूप में आपके ऊपर दबाव डाल सकते हों,आपको अनुशासन में
रखने के लिए समर्थ हों।ॠषि वह जो आदमी को मजबूर कर सकते हैं, जो आदमी से धड़ल्ले से कह सकते हैं।आप ॠषि का अनुशासन पाये बिना आगे नहीं बढ़ सकते
कुसंस्कारों से छुटकारा नहीं पा सकते।ॠषि का पूजन हमने इसलिए कराया कि आपके जीवन में अनुशासन आये।ऋषि हमारे जीवन की महती आवश्यकता है।ऋषि का सम्पर्क जिनसे हो गया,वे धन्य हो गये।हिमाचल के राजा की लड़की से नारदजी का सम्पर्क हो गया,वह धन्य हो गई।वाल्मीकि जी से नारदजी का सम्पर्क हुआ,वह भी
धन्य हो गये।कैसे हो गया ? दबाव डालने वाले व्यक्ति जो
आदमी की इच्छा के विरुद्ध भी बात कह सकते हों,उसे नाखुश भी कर सकते हों और उस पर झल्ला भी सकते हों-ऐसे आदमी कौन होते हैं ? ऋषि जीवन को ऊँचा उठाने,आगे बढ़ाने के लिए आदमी को उन लोगों के साथ सम्पर्क बनाना चाहिए।ऐसे आधार खड़े करने चाहिये जिनके बल पर हमारे लिए आगे बढ सकना संभव हो सके।श्रेष्ठ जीवन जीने,भगवान के  रास्ते पर चलने की,भगवान का प्रिय होने की,परमार्थपरायण होनी की,अध्यात्म का जीवन में विकास होने की आवश्यकतायें हैं ये ।

                                   परमपूज्य गुरुदेव
                          (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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