अमृतवाणी-70/71/72

अमृतवाणी
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गायत्री ध्यान करने के लिये वास्तव में कोई महिला
नहीं ,विवेकशीलता और विचारशीलता की धारा के
प्रवाह का नाम है,जो इस विश्व में प्रवाहित है,जो मनुष्य के मस्तिष्क को,क्रिया-कलाप को और अन्तरात्मा को छूता है।ध्यान के समय आप हँस पर सवार हुई गायत्री का ध्यान करें बेशक,लेकिन यह भी ध्यान करें कि गायत्री माता सिर्फ़ हँस पर सवार होंगी,बगुले पर नहीं।हँस वह जो नीर-क्षीर का भेद जानता हो।दूध पी लेता हो,पानी को फेंक देता हो।
इस दुनिया में पाप और पुण्य,अनुचित और उचित
दोनों मिले हुये हैं।अन्तरात्मा जिसे अनुचित कहे,उसे
हम ठुकरायें।जिसे उचित कहे उसी को स्वीकार करें
यह है हँसवृत्ति।यह है हँस पर सवारी।

                             परमपूज्य गुरुदेव
                    (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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मित्रो,मैंने गायत्री उपासना को ऋतम्भरा-प्रज्ञा के रूप में समझने की कोशिश की और समझाने की भी।लेकिन लोगों ने उसके बाह्य कलेवर को जो सुगम था और ऐसा मालूम पड़ता था कि हमारी
कामनाओं और इच्छाओं को पूरा करने में सहायक हैं,उतने वाले हिस्से को पकड़ लिया और बाक़ी वाले
हिस्से को गये भूल।असंयमी रोगी के लिये अच्छा हकीम कौन ? वह जो मनमर्ज़ी का भोजन करने दे।
सबसे अच्छी देवी कौन ? जो हमारी कामनाओं को
पूरा करे।वही देवी है गायत्री।

                         परमपूज्य गुरूदेव
                (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

अमृतवाणी
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अपनी इच्छा के अनुरुप हमने देवता को ढालने की
कोशिश की इसीलिये देवता की समीपता से पूर्ण-
तया वंचित रहे और वंचित रहेंगे।जिन्होंने भगवान की इच्छा के अनुरुप स्वयं को ढालने की कोशिश की,वे भगवान के कृपापात्र बन गये और सारे माहा-
त्म गायत्री के प्राप्त कर सके।मैंने ऐसा ही जीवन जिया,इसी रूप में गायत्री मंत्र को समझा,उपासना
की,जप किया और जप के साथ भावनाओं को
हृदयंगम किया ।
              
                                  परमपूज्य गुरुदेव
                         (पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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