अमृतवाणी-155/156/157
(श्राद्ध विशेष)
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उदात्त आत्माएं पितर रूप में समस्त सत्पात्रों की सहायता के लिए सदैव प्रस्तुत रहती हैं। उनकी आत्मीयता की परिधि अति विस्तृत होती है। ये पितर सत्ताएं पात्रता देखती हैं, परिचय की पृष्ठभूमि नहीं। क्योंकि सत्पात्र का परिचय उन्हें तो मिल ही जाता है और दूसरे को अपना परिचय देने की उनकी कोई निजी आकांक्षा नहीं होती। वे तो कल्याण-पथ में नियोजित कर देना ही अपना कर्तव्य मानती हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी को एक पितर-सत्ता ने ही श्री हनुमान और भगवान् राम के दिव्य-दर्शनों की विधि सुनाई थी और उन्हें एक अनाथ भावनाशील बालक से एक भक्त महाकवि और सन्त बन जाने में विशेष भूमिका निभाई थी।
थियोसॉफिकल सोसाइटी की जन्मदात्री मैडम ब्लैवटस्की को चार वर्ष की आयु से ही पितर आत्माओं का सहयोग सान्निध्य प्राप्त होने लगा। वे अचानक आवेश में आकर ऐसी तथ्यपूर्ण बातें कहती जिन्हें कह सकना किन्हीं विशेषज्ञों के लिए ही सम्भव था। परिवार के लोग पहले तो उन्हें विक्षिप्त समझने लगे, पर जब उनके साथ देवात्माओं के प्रत्यक्ष सम्पर्क के प्रमाण देखने लगे तो उनकी विशेषता स्वीकार करनी पड़ी।
एक बार एक प्रेतात्मा ने उसके शरीर के कपड़े ही मजाक में बिस्तर के साथ सीं दिये। दूसरे लोगों ने जब वह सिलाई उधेड़ी तभी वे उठ सकीं। एक बार कर्नल हैनरी आल्काट उनसे मिलने आये तो वे सिलाई की मशीन से तौलिये सीं रही थीं और कुर्सी पर पैर पटक रही थी। आल्काट ने पैर पीटने का कारण पूछा तो उनने कहा एक छोटा प्रेतात्मा बार-बार मेरे कपड़े खींचता है और कहता कि मुझे भी कुछ काम दे दो। कर्नल ने उसी मजाक में उत्तर दिया कि उसे कपड़े सीने का काम क्यों नहीं दे देतीं? ब्लैवटस्की ने कपड़े समेट कर अलमारी में रख दिये और उनसे बातें करने लगी। बात समाप्त होने पर जब अलमारी खोली गई तो सभी बिना सिले कपड़े सिये हुए तैयार रखे थे।
मैडम ब्लैवेटस्की के कथनानुसार उनकी सहकारी मण्डली में सात-प्रेत थे, जो समय-समय पर उन्हें उपयोगी परामर्श और मुक्त हस्त सहायता करते थे। कर्नल आल्काट अमेरिका में अपने समय के अत्यन्त सम्मानित नागरिक और प्रसिद्ध वकील थे, उन्होंने मैडम से प्रभावित होकर उनके अध्यात्म कार्य में सदा भरपूर सहयोग दिया। ब्लैवेटस्की एक बार अपने सम्बन्धियों से मिलने के लिए रूस गई। वहां उसके भाई के कान में भी उनकी दिव्य शक्ति की चर्चा पहुंची। उसने इतना ही कहा कि मैं मात्र बहिन होने के कारण उनकी बातों पर विश्वास नहीं कर सकता। मैडम ने अपने भाई को एक हलकी-सी मेज उठाकर लाने के लिए कहा—वह ले आया। अब उन्होंने फिर कहा इसे जहां से लाये हो वहीं रख आओ। भाई ने भरपूर जोर लगाया पर वह इतनी भारी हो गई कि किसी प्रकार न उठ सकी। इस पर घर के अन्य लोग आ गये और वे सब मिलकर उठाने लगे इतने पर भी वह उठी नहीं। जब सब लोग थक कर हार गये तो मैडम ने मुस्करा कर उसे यथावत् कर दिया और मेज फिर पहले की तरह हलकी हो गई। उसे उठा कर आसानी से जहां का तहां रख दिया गया।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
(श्राद्ध विशेष)
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अशरीरी आत्माओं का अस्तित्व और उनके द्वारा मनुष्य को सहयोग यह एक तथ्य है। डरावनी या घिनौनी प्रकृति के भूत प्रेत कम ही होते हैं। साधारणतया उच्च आत्माएं मनुष्यों की सहायता ही करती हैं और अपनी उच्च प्रवृत्ति के कारण दूसरों को आगे बढ़ाने तथा खतरों से बचाने के लिये पूर्व संकेत भी करती हैं। जिस प्रकार उदार मनुष्य अकारण दूसरों की सेवा सहायता करने के लिये तैयार रहते हैं वैसे ही सूक्ष्म शरीरधारी आत्माएं लोगों को उपयोगी ज्ञान देने अथवा आत्मा का अस्तित्व शरीर न रहने पर भी बना रहता है यह विश्वास दिलाने के लिये कुछ व्यावहारिक सहयोग देती रहती हैं।
महान् सन्त सुकरात के बारे में बताया जाता है कि प्रारम्भिक जीवन में उन्हें धर्म-कर्म एवं अदृश्य जीवन पर कतई विश्वास नहीं था। एक दिन उन्हें एक प्रेत मिला। उसने अतीन्द्रिय दर्शन की क्षमता उनमें विकसित करने हेतु भगवत् भजन का परामर्श दिया। शीघ्र ही सुकरात की यह क्षमता विकसित हो गई। प्रेत उन्हें आजीवन विशिष्ठ मामलों में जानकारी व परामर्श देता रहा। इससे सुकरात सहस्रों व्यक्तियों का कल्याण करते। उन्होंने बताया तो यह तथ्य अपने साथियों को भी। पर साथी-सहयोगी प्रेत को देख नहीं सकते थे, अतः वे सुकरात के भविष्य-कथन आदि को उन्हीं की चमत्कारिक शक्ति मानने लगे।
प्लेटो, जेनोफेन, प्लुटार्क आदि विद्वानों ने सुकरात के जीवन की प्रामाणिक घटनाओं पर प्रकाश डाला है। उन सभी ने स्वीकार किया है कि—सुकरात ने अनेकों बार यह कहा—‘‘मेरे भीतर एक रहस्यमय देवता ‘डेमन’ निवास करता है और वह समय पर मुझे पूर्व सूचनाएं दिया करता है।’’ इस तथ्य की यथार्थता के अनेक प्रमाण उद्धरण भी उपरोक्त लेखकों ने प्रस्तुत किये हैं।
प्लूटार्क ने अपनी पुस्तक ‘‘दी जेनियो सोक्रिटिस’’ में एक घटना दी है—एक बार सुकरात अपने कई मित्रों के साथ एक रास्ते जा रहे थे। सहसा वे रुक गये और कहा इस रास्ते हमें नहीं चलना चाहिये खतरा है। कइयों ने उसकी बात मान ली और वह रास्ता छोड़ दिया पर कई इस साफ सुथरे रास्ते को छोड़ने के लिये तैयार न हुये। वे सुकरात की सनक को बेकार सिद्ध करना चाहते थे। वे कुछ ही दूर गये होंगे कि जंगली सुअरों का एक झुण्ड कहीं से आ धमका और उनमें से कइयों को बुरी तरह घायल कर दिया। प्लेटो ने अपनी पुस्तक ‘‘थीवीज’’ में एक प्रसंग दिया है—एक दिन एक तिमार्कस नामक युवक सुकरात के पास आया कुछ खाया पिया। जब चलने लगा तो सुकरात ने उसे रोका और कहा अभी तुम जाना मत, तुम्हारे ऊपर खतरा मंडरा रहा है। तीन बार उसने जाने की चेष्टा की पर तीनों बार सुकरात ने उसे पकड़ कर बल पूर्वक रोक लिया। पीछे वह नहीं ही माना और हाथ छुड़ा कर चला गया। दूसरे ही दिन उसने एक खून कर डाला और फांसी पर चढ़ाया गया। ऐसी ही अन्य कितनी ही घटनाएं हैं जिनमें सुकरात के उसके सहचर देवता ‘डेमन’ द्वारा पूर्वाभास दिये जाने तथा सहायता करने के प्रमाण मिलते हैं।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
(श्राद्ध विशेष)
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सुकरात पर जब मुकदमा चला और प्राणदण्ड दिया जाने लगा, उस समय उसके पास ऐसे प्रमाण थे और साधन थे, जिन से प्राणदण्ड से छुटकारा सम्भव था। ऐन्थेस की जेल से उसके मित्र एवं शिष्य भाग ले जाने हेतु भी पूर्ण तैयारी कर चुके थे। किंतु सुकरात ने न्यायालय में स्वीकार किया—अभी-अभी मेरा देवता, ‘डेमन’ मेरे कानों में कहकर गया है कि—मृत्यु दण्ड मिलेगा, उससे डरने की कोई बात नहीं है, ऐसा मृत्यु मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होती है।
इंग्लैण्ड के राज घराने में प्रेतात्माओं की अनुभूतियों का वर्णन चार्ल्स डिकेन्स अपने उपन्यास मिस्ट्री आव एडविनहुड में किया है। पुस्तक के बीस अध्याय लिखकर ही वे स्वामी हो गये थे। मृत्यु के दो वर्ष बाद उन्होंने थामस जेम्स को लिखने का माध्यम बनाने के लिए तैयार किया और उनकी कलम से अपना शेष कार्य स्वयं पूरा कराया। श्रीमती जान कूपर का ‘टेल्का’ उपन्यास विशेष रूप से और अन्य सामान्य रूप से प्रख्यात हुए हैं। श्रीमती कूपर का कथन है इस लेखन में उन्हें किसी दिव्य आत्मा का मार्ग दर्शन और सहयोग मिलता रहा है।
अमेरिका की श्रीमती रूथ मान्टगुमरी का कथन है कि उनका ‘ए वर्ल्ड बियोन्ड ग्रन्थ’ स्वर्गीय आर्थर फोर्ड की आत्मा ने बोल-बोल कर लिखाया है।
इंग्लैण्ड के सुप्रसिद्ध लेखक तोएल कोवर्ड ने अपनी प्रख्यात रचना ‘दि व्लिथे स्प्रिट’ के सम्बन्ध में लिखा है कि यह लेखन उसने किसी अदृश्य साथी के सहयोग से लिखा है। ‘जान आफ आर्क’ ने अपने आत्मा परिचय में यह जानकारी दी थी कि उन्हें विशिष्ट काम करने की प्रेरणा और शक्ति किसी अदृश्य आत्मा से मिलती है।
ब्रिटिश कस्बे गलोसेस्ट-शायर में रहने वाली छियालीस वर्षीया पैट्रिशिया मूलतः कनाडा की रहने वाली लेखिका हैं। उनका कहना है कि कई वर्ष पूर्व वे महान नाटककार जार्ज बर्नार्डशा से आयरलैंड की किर्लानी झील के तट पर एक होटल के एक कमरे में मिली थीं और दोनों में प्यार हो गया। बर्नार्डशा अपनी मृत्यु के बाद भी प्रतिदिन रात में मेरे कमरे में आकर मुझसे मिलते हैं। मृत्यु उपरान्त पहली रात जब जब शां की आत्मा आई, तो दोनों ने एक वर्णमाला तैयार कर ली। उसी के आधार पर दोनों में बातें होती हैं। पेट्रीशिया जार्ज बर्नार्डशा को ‘बर्नी’ कहती हैं। उनके अनुसार बर्नी ने उन्हें एक अंगूठी विवाह की रस्म पर दी थी। यह विवाह बर्नार्ड शा की मृत्यु के बाद हुआ। वह अंगूठी पेट्रीशिया की हथेली पर हरदम चमचमाती रहती है। पेट्रीशिया के एक बच्चा भी है, जिसे वह शा का यानी अपने बर्नी का बताती है। हालांकि जार्ज बर्नार्ड शा की मृत्यु के 10 वर्ष बाद यह बच्चा हुआ है।
पेट्रीशिया के अनुसार वह इन दिनों जो कुछ भी साहित्य लिख रही हैं वह बर्नी की ही प्रेरणा से। उसके कमरे में जार्ज बर्नार्ड शा की एक बड़ी तस्वीर है। मकान में इस युग में भी कभी बिजली नहीं जलती। बारह कमरों वाले दो मंजिले मकान में सिर्फ दो-तीन कमरों में पुराने लैम्प टिमटिमाते हैं। शेष भाग घने अन्धकार में लिपटे रहते हैं। एकान्त में वह अक्सर अदृश्य ‘बर्नी’ से बातें करने लगती है।
परमपूज्य गुरुदेव
(पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)
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