गुरुगीता-5

गुरुगीता -4
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सन् 1860 से 63 तक-तीन वर्ष में दयानंद जी ने गुरु सानिध्य में रहकर शास्त्राध्ययन और साधन मार्ग का प्रशिक्षण प्राप्त किया और जब गुरुगृह से सन्यासाश्रम की दीक्षा लेकर विदा होने लगे तो गुरुदेव ने अपने शिष्य से दीक्षा मॉगी - दयानंद मुझे दक्षिणा में क्या दोगे?
  "गुरुवर यही तो मैं भी सोच रहा हूँ ।"
  "तेरे पास क्या है रे जो मॉगू ।"-गुरु ने कहा ।
  "बहुत कुछ है। जो भी चाहे मॉग लो।आज तो इन्कार न करूँगा ।"
  'तो ठीक है अपना सारा जीवन ही मुझे दे डाल । मन में बड़ी साध है कि वैदिक धर्म के संबंध में फ़ैली भ्रान्तियाँ दूर
  करूँ ।उस कार्य को तू पूरा करना ।'
  बिना सोच-विचार किये दयानंद जी ने कह दिया जो आज्ञा
  पूज्यवर और ॠषि ने अपने शिष्य को छाती से लगा लिया ।इस अनूठे आत्मदान के साथ ही गुरु के अजस्र अनुदान भी प्रवाहित हो उठे और आत्मदान का संकल्प पूरा करने के लिए दयानंद निकल पड़े । इस गुरूदक्षिणा को स्वामी दयानंद जी ने किस प्रकार चुकाया यह सर्वविदित है ।
 
गुरुगीता पाठ
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लोकोपकारक: प्रश्नो न केनापि कृत: पुरा ।
दुर्लभं त्रिषु लोकेषु तच्छुणुष्व वदाम्यहम् ।
किंचित् गुरुं विना नान्यत् सत्यं सत्यं वरानने ।।6।।
अन्वयः-
पुरा - पहले, लोकोपकारक: - लोक का उपकारक, प्रश्न: -
यह प्रश्न, केन - किसी के द्वारा, अपितु - भी, नकृत: - नहीं किया गया, वरानने-हे सुवदने,  अहम्- मैं, वदामि - बोलता हूँ ,त्वम् - तुम, श्रुणुष्व - श्रवण करो,गुरुं बिना - गुरु बिना,
अन्यत् - अन्य, किंचित्- कुछ भी, त्रिषु-तीनों, लोकेषु- लोकों में, दुर्लभम्-दुर्लभ, न - नही है, सत्यं- सत्यम्- सच सच ,कहता हूँ ।।6।।
अर्थ-
पहले इस प्रकार का लोकोपकारक प्रश्न किसी ने नहीं किया
हे उत्तम प्रश्नकारिणी सुवदने! मैं कहता हूँ- तुम सुनो ।गुरु के बिना इस त्रिभुवन में और कुछ दुर्लभ नहीं है - मैं सत्य सत्य कहता हूँ ।
6. Such a type of benedictory question has never been asked by anybody  before.
O beautiful faced, I narrate it and you please listen to it. I tell you truthfully and
honestly that there is nothing more precious and rare than tha Master in these three worlds.
COMMENTS
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This world becomes different when one
attains tha Master and everything becomes blissfull.This dense form of
Consciousness, existence and bliss is beyond mind and intellect because God
alone in- carnates in the form of the Master hence tha Master is most precious. It is by the grace of Master alone that individual essentially attains eternal peace.
                            👣🙏

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