सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-8

प्यार का प्रवाह उमड़े ही जा रहा था थमने का नाम ही  नहीं ले रहा था ।
एक-एक कर जब सबके हाथों में राखी बँध गई, तो सबको मिठाई और नमकीन बॉटी गई, कुछ तो खुद न खाकर हम सबको थोड़ा सा खिलाने का प्रयास करने लगे।बहुत ही अनुशासित ढंग से सब चल रहा था कि इतने में एक भाई ने कुछ कहने के लिए हाथ खड़ा किया।जब पूछा कि क्या कहना है तो पास आकर एक अंगोछा जो कंधे पर डाल रखा था अपने, जबरन देने लगा।और ना करने पर रोकर कहने लगा कि मेरे तो घर में भी कोई नहीं।मॉ-बाप पहले ही ग़म में चल बसे,घरॉली (पत्नी) भीतर आने के बाद छोड़ गई,आप सभी मेरा परिवार हो,कहकर शांति माता जी के चरणों में वह अंगोछा रख दिया। हम सभी यह देखकर और
आश्चर्यचकित थे कि इन लोगों में भी भावनायें होतीं हैं, ये भी अपनापन चाहते हैं  ? मन तो कर रहा था कि उन सभी लोगो को (जो सहायता मॉगने पर भाषण पिला रहे थे) पकड़ कर दिखाऊँ कि आप लोग जैसा कह रहे थे, यहॉ तो उससे उलट मामला है।हर व्यक्ति एक सा नहीं होता, हर व्यक्ति अपराधी भी नहीं होता ? भावविहीन भी हर कोई नहीं होता । जो सचमुच अपराधी हैं वे तो खुले आम बाहर घूमते हैं, कुछ होंगे थोड़े बहुत  ? जो अन्दर भी होंगे ? लेकिन मन इस समय कुछ भी खराब सोचने को तैयार नहीं था । सफेद कुर्ते पायजामे व सफ़ेद टोपी सब कुछ बाहर भीतर से पवित्र ही लग रहा था । गुरुदेव जानें कि उन्होंने इतनी सकारात्मक ऊर्जा कैसे प्रवाहित कर रखी थी ।कुछ बहनें जो पहली बार आई थीं और अन्दर से डर भी रहीं थीं, वे भी सब कुछ भूल कर भावुक हो रही थीं।इस तरह उस दिन हमारी सजा पूरी हुई, अन्त में सत्संकल्प व नारे आदि बुलवाकर कार्यक्रम की समाप्ति की।
   जब अधीक्षक महोदय के कमरे में आये तो उनकी ओर से चाय के साथ अल्पाहार की व्यवस्था थी, इतने में एक बन्दी    भाई खाने का थाल लेकर आया,जिसे अधीक्षक महोदय रोजाना चखते थे ताकि खाना बनाने वाले भाइयों में उत्साह बना रहे तथा खाने की क्वालिटी भी अच्छी बनी रहे, उन्होंने हमें भी उसमें से चखने को कहा । कुछ ने नहीं चखा क्यों कि उनका मानना था कि जेल का खाना खाने से कर्जा उतारने कभी हमें भी अन्दर न आना पड़ जाये।लेकिन हमें  तो पहले ही सजा काटने भेजा था गुरुदेव ने, इसलिए सोच ही नहीं पाये, और खुशी-खुशी चख लिया ।सच कहूँ तो अधीक्षक महोदय ने तो एक ग्रास ही चखा था,हम पूरा थाल  ही चट कर गये,क्योंकि भाई के घर से बहन भूखी भी कैसे जाये । इसके पीछे बन्दी भाई ही नहीं प्रशासन का प्यार भी था। इस तरह न राखी के दिन और ना ही ॠषि पंचमी के दिन वरन् गुरुदेव माताजी ने जो मुहूर्त निकाला, रक्षा-बंधन के बाद वाला रविवार वही हमारे बहन-भाई के त्यौहार का दिन निर्धारित किया था हमारी परमसत्ता ने ।
                                   'गुरुकॄपा केवलम्'
                              "गुरुवर शरणम् गच्छामि "
                                         👣🙏

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