अमृतवाणी-139/140/141

आत्मसंतोष के अलावा समाज का सहयोग व भगवान का अनुग्रह कैसे मिल सकता है, शानदार जिन्दगी कैसे जीनी चाहिए  ? इसके लिए हमारे यहाँ ट्रेनिंग चलती है।ट्रेनिंग तो पहले भी चलती थी।नौ दिन की, पॉच दिन व एक माह की,पर अब हमने सारे के सारे शांतिकुंज को विश्वविद्यालय के रूप में परिणत कर दिया है।
आज मनुष्य को जीना कहॉ आता है  ? जीना भी एक कला है।सब आदमी खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं और मौत के मुँह में  चले जाते हैं, किन्तु जीना नहीं जानते।जीना बड़ी शानदार चीज़ है ।इसको संजीवनी विद्या कहते हैं-जीवन जीने की कला।यहॉ हम अपने विश्वविद्यालय में, शांतिकुंज में जीवन जीने की कला सिखाते हैं और यह सिखाते हैंकि आज के गये-बीते जमाने में आप अपनी नाव पार करने के साथ-साथ सैकड़ों आदमियों को बिठाकर पार किस तरह से लगा पाते हैं  ? नाव चलाना भी एक कला है।हम आपको नाव दे दें व आपको नदी के किनारे छोड़ दें, कहें कि आप जाइये तो इतने मात्र से आप नाव नहीं चला सकेंगे।कहीं लहरों के चक्कर में पड़ेंगे और बहते हुये चले जायेंगे। नाव को डुबो देंगे और आप भी डूब जायेंगे।लेकिन अगर आपको ट्रेनिंग मिली हो तो आप सकुशल पार हो जायेंगे।
       
                             परमपूज्य गुरुदेव
                   (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

मित्रों!हिमालय की अपनी महत्ता है।सारे ॠषियों ने वहीं निवास किया था।स्वर्ग भी पहले वहीं थ।ॠषियों की भूमि
भी वही है।बड़ी सामर्थ्यवान, बड़ी संस्कारवान भूमि है।हमको भी तप करने के लिए वहां भेज दिया गया था और अब हम यहाँ सप्तॠषियों की भूमि शांतिकुंज में है। देवात्मा हिमालय का अपना महत्व है।गंगा का अपना महत्व है।गंगा अपने में आध्यात्मिक शक्तियों को समेटे हुए है।यह न केवल उसके पीने के पानी में है, बल्कि वह जहाँ होकर बहती है वहॉ का वातावरण भी कुछ विशेष होता है।सप्तॠषियों की भूमि, जहाँ सातों ॠषियों ने तपश्चर्या की थी और जो अभी भी ऊपर आसमान में दिखाई पड़ते हैं।उनकी जो भूमि है-सप्तॠषि भूमि, वह भी यहीं है, जहाँ आपका शांतिकुंज बना हुआ है और भी गंगा के किनारे  बहुत से ऐसे स्थान हैं,जहाँ सिंह और गाय कभी एक घाट पर पानी पीने लगते थे।ऐसे प्राणवान स्थान भी होते हैं और सिद्धपुरुष भी होते हैं।हम यहां ऐसे स्थान पर ही आये हैं।यहाँ आकर हमने आपकीभावनाओं को दिव्यता का स्मरण कराने के लिए देवात्मा हिमालय का एक मन्दिर बना लिया है।हिमालय का मन्दिर और कहीं नहीं मिलेगा आपको।

                                      परमपूज्य गुरुदेव
                             (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

लोगों ने देवताओं के मन्दिर बनाये हैं, अमुक के मन्दिर बनाये हैं, तमुक के मन्दिर बनाये हैं, पर हिमालय का मन्दिर
सिर्फ़ आपको यहीं देखने को मिलेगा।हमने यह भी बनाया है ।यह सप्तॠषि की भूमि है।सप्तॠषियों की भूमि और कहॉ है, बताइये आप  ? कहीं नहीं है मात्र यहीं पर है,जहाँ
आज शांतिकुंज बना हुआ है।गंगा पहले यहीं पर बहती थी।
यहाँ की थोड़ी-सी ज़मीन भर गई है, इसलिए शांतिकुंज वाली ज़मीन में जो पानी हजारों वर्षों से बहता था वह बन्द नहीं हुआ है। वह धारा अभी भी बह रही है, उसके लिए सामने रास्ते बना दिये गये हैं।
हिमालय मन्दिर क्या है  ? ये प्रतीक क्यों बना दिये हैं  ? प्रतीकों का अपना-अपनामहत्व है। एकलव्य ने द्रोणाचार्य का प्रतीक बना लिया था। रामचन्द्र जी ने शंकर जी का प्रतीक बनाया था। जब वे वनवास गये थे और सीता हरण के कारण दुखी मन से वन-वन भटक रहे थे, उस समय उन्हें जब प्रतीक की आवश्यकता हुई तो उन्होंने शंकर जी के मन्दिर की स्थापना की थी,रामेश्वर में।ये सब प्रतीक हैं,जैसे तिरंगा झण्डा अपना राष्ट्रीय प्रतीक है।कम्यूनिस्टों का भी झण्डा होता है।लोग कहते हैं कि वे प्रतीकों को नहीं मानते।कैसे नहीं मानते  ?

                               परमपूज्य गुरुदेव
                      (पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य)

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