सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-19

अतीत के झरोखे में एक भाई और याद आया।(रामचन्द्र सभी उसे रावजी के नाम से बुलाते थे)यह असली नाम है चूँकि वह भाई अब हमारे बीच नहीं है। जिसे 4/5/96 को  फॉसी की सजा दे दी गई थी, उसकी आत्मा की शांति के लिए दिनॉक 7/5/96 को हम सभी को यज्ञ कराना था। मन बहुत खराब था, हॉलाकि हम लोग उससे मिले नहीं थे,क्यों कि तब तक हम फॉसी के बाड़े में नहीं जाते थे या यूँ कहा जाये कि इस बात का कभी कोई ख़याल ही नहीं आया। चौथे दिन यज्ञ था, यज्ञ के एक दिन पहले की पूरी रात नींद नहीं आई, बार-बार ऐसा विचार आता रहा कि गुरुदेव ने उससे मिलने का विचार क्यों नहीं आने दिया  ? क्या गुरुदेव की कृपा उसे  नहीं मिलनी थी  ? न जाने क्या-क्या ख़याल आते रहे, कब सुबह हुई पता ही नहीं चला। जो समय दिया गया था, उस समय पर हम सभी यज्ञ कराने जेल परिसर में पहुंच चुके थे। यज्ञ सम्पन्न हुआ, जेल स्टॉफ, जेल अधीक्षक,जेल निदेशक एवं बन्दी भाई भी यज्ञ में  सम्मिलित हुये। वहां से लौटने के बाद हम सभी ने विचार किया कि किस तरह से फॉसी के बाड़े  में जाने की अनुमति ली जाये। यह सोचते और जेल जाते लगभग 4 माह और बीत गए लेकिन फॉसी के बाड़े में जाने की बात दिमाग से निकल नहीं रही थी, तब तक नवरात्रि साधना के दिन आ गए, सुबह से शाम तक वही दिनचर्या।चयनित बन्दी भाइयों को अलग बैरक में रखकर साधना कराई जाने लगी,एक दिन अचानक ही गुरुदेव की प्रेरणा हुई कि नवमी के दिन फॉसी के बाड़े में जाने की अनुमति ली जाये। वैसे भी नवमी के दिन हर बाड़े में जाकर चना और हलुवा का प्रसाद हम सभी बन्दी भाईयों तक पहुँचाने का प्रयास करते थे, तो क्यों न फॉसी के बाड़े में जाने की अनुमति की बात अधीक्षक महोदय से की जाये।
नवरात्रि का चौथा दिन था, हम लोग दिन भर तो वहां रुकते ही थे, मौका देखकर हम अधीक्षक महोदय के कमरे में गये,और मन की बात उनको बताकर अनुमति मॉगी। बहुत सोच-विचार के बाद हमें यह समझाते हुए कि फॉसी के बाड़े में आपके साथ कुछ सिपाही जायेंगे, बन्दी अपनी बैरक से बाहर नहीं निकाले जायेंगे,आप लोहे के गेट की ग्रिल से उन्हें प्रसाद दे सकते हैं। हम सभी बहुत खुश हो गये सोचने लगे कि गुरुदेव किस तरह रास्ता दिखाते हैं तथा अनुमति भी दिलाते हैं।नवमी के दिन का हम बहुत ही बेसब्री से इन्तज़ार करने लगे।
"मेरे गुरुदेव आपकी कृपा अनन्य हैं, जिनका वर्णन कभी भी आपकी कृपा के बिना संभव ही नहीं। ये मन ,ये विचार, ये लेखनी,ये वाणी,ये तन ,यहाँ तक कि हर जन्म सिर्फ़ और सिर्फ़ आपके चरणों की सेवा एवं गाथाओं का गुणगान करते बीते। बस यही याचना है।"
                                            क्रमशः!
                                    'गुरुकॄपा केवलम्'
                                "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                            👣🙏

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