गुरुगीता-35
श्रीकांत पद्भनाब शस्त्र कला में निपुण थे, उनके सैन्य गुरुकुल में विद्यार्थी, जिज्ञासु, और शस्त्र साधकों का ताँता लगा रहता था | श्रीकांत बिना किसी के जाति-वर्ण देखे, केवल उसकी प्रवृति देखकर शस्त्र शिक्षा दिया करते थे| इसके बदले केवल एक ही वचन गुरुदक्षिणा स्वरुप लेते थे, वो भी ये कि जब भी भारत भूमि रक्षार्थ आवश्यकता अनुभव होगी उनके हर विद्यार्थी को भारत की रक्षा का दायित्व निभाना होगा| अपने निस्वार्थ विद्या दान के लिये प्रशिद्ध श्रीकांत पदमनाभ एक आदर्श गुरु और उच्च कोटि के शस्त्र विद्या पंडित थे |
एक दिन उनके गुरुकुल में ऐसे ही एक जिज्ञासु आया, जो उनसे तलवारबाज़ी सीखना चाहता था | उसने गुरु से पूछा, ‘क्या आप मुझे इस देश का सर्वश्रेष्ठ वीर बना सकेंगे?‘क्यों नहीं… दस साल में मैं तुम्हें उस लायक तैयार कर दूँगा’ गुरुजी ने कहा। ‘ओह, दस साल? पाँच साल में यह क्षमता आनी चाहिए गुरुदेव! मैं दूसरों की तुलना में दुगुनी मेहनत करने को तैयार हूँ।’
श्रीकांत पद्भनाब ने कहा, ‘तब तो बीस साल लगेंगे। चेला चकित रह गया, ‘यदि उतनी मेहनत काफी नहीं हो तो चौगुनी ज्यादा मेहनत करने के लिए तैयार हूँ।’
‘ऐसा करोगे तो चालीस साल लग जाएँगे न?’ गुरु ने कहा। शिष्य अब निरुत्तर था, उसने गुरुदेव को उनके कथन का आधार जानना चाहा|
गुरुदेव बोलें- सफलता पर ही ध्यान रखते हुए कड़ी मेहनत करने पर भी मन में ‘कामयाबी मिलेगी या नहीं मिलेगी इस द्वंद्व के चलते तनाव, आशंका, चिंता, मानसिक क्लेश आपके ऊपर हावी हो जाएँगे, जिसे आपकी विद्या ग्रहण की क्षमता एवम गुणवत्ता प्रभावित होगी। और जल्दीबाज़ी के कारण ज्यों-ज्यों आप अपने को, अपने शरीर को ज्यादा दुख देंगे, लक्ष्य को पाने में उसी अनुपात में ज्यादा समय लगेगा।
विद्या का लक्ष्य आपको ज्ञान देकर आपके जीवन को सहज बनाना है, आप जितनी तन्मयता से उसका अभ्यास पूरे समर्पण के साथ करेंगे, उतना ही आप उस विद्या में निपुण होते जाएंगे| विद्या के अभ्यास में समय देना होगा, जल्दी और दुगनी मेहनत से हो सकता है, आप कुछ एक कला में अग्रसर हो जाये पर निपुणता और कार्य में संतोष आप कभी नहीं प्राप्त कर पाओगे | ज्ञान को ग्रहण कर उसके प्रयोग को सफलतम बनाने के आतंरिक सुख से आप वंचित रह जाओगे | इस तरह गुरुदेव ने जिज्ञासु को ये समझाया की कड़ी मेहनत करने वाले लोग कभी-कभी सफल तो हो जाएँगे, लेकिन वे उसकी खुशी का अनुभव नहीं पा सकते।
गुरुगीता पाठ
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गुरुरादिरनादिश्च गुरु: परमदैवतम्।
गुरो:परतरं नास्ति तस्मै श्री गुरवे नम:।।37।।
अर्थ
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गुरु सृष्टि का आदि एवं स्वयं अनादि हैं, गुरु परमदेवता है ।गुरु की अपेक्षा श्रेष्ठतर कुछ नहीं है।ऐसे गुरुदेव को प्रणाम करता हूँ।।37।।
37.
The Master is the beginning of the of the World and has no beginning for himself. He is the Deity par- excellence, Nothing is more esteemed as compared to him. I offer my Salutations to such a Master.
👣🙏
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