सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-20

जिस दिन का इन्तजार था आखिर वो दिन आ ही गया यानी नवरात्रि के नवमी का दिन। यज्ञ सम्पन्न होते ही सबसे पहले हमने फॉसी के बाड़े में जाने की तैयारी शुरू की,आपस में तय किया कि बाकी के बाड़ों में प्रसाद देने बाद में जायेंगे।पूजा का थाल, जिसमें रोली, कलावा, फूल, नौ दिन की पूजा के कलश का जल,प्रसाद और इसके साथ ही गायत्री मंत्र लेखन की कापियां,जप के लिए माला,  गुरुदेव-माताजी की तस्वीरें, पढ़ने के लिए गुरुदेव की किताबें। ऐसा लग रहा था कि जो कुछ भी है सब कुछ ले जायें, लेकिन अनुशासन में जो बँधे थे। दो-तीन सिपाहियों के साथ हम लोग फॉसी के बाड़े के बाहर पहुँचे तो सिपाही ने गेट खोल दिया और सिपाहियों के साथ हम अन्दर पहुँच गये । लगभग 12 बैरक थीं।एक-एक करके सभी बैरकों के  बाहर से सभी भाइयों से मिले। बैरक के दरवाज़े की ग्रिल के अन्दर हाथ डालकर पूजा का जल छिड़का, तिलक लगाकर कलावा बॉधा। बहुत ही प्यार से पूछा कि फॉसी की सजा मिली है, उन्होंने कहा कि हॉ!हमने पूछा फाइनल है क्या  ?  जवाब मिला-
" फाइनल सा ही है "। तब उनको अच्छे से समझाया कि जब मरना ही है, करने को कोई काम भी नहीं है तो क्यों न भगवान का नाम ही ले लिया जाये और इस तरह वे लोग तैयार हो गये। फिर उन्हें माला, गायत्री चालीसा  ,साहित्य और मंत्र लेखन की कापियां व लाल पैन दीं तथा हम सभी ने गुरुदेव से प्रार्थना की कि हमारे साथ-साथ ये लोग भी अब आपकी शरण में है ,हे गुरुदेव आप हम सभी पर कृपा करें और इन्हें विशेष अनुदान का भागीदार बनायें। अखबार में प्रसाद रखकर फोल्ड करके गेट की ग्रिल से उनके बर्तन में डाल दिया।बहुत खुश हो गये वे सभी, लेकिन हम लोग वहॉ से बहुत ही भारी मन लेकर लौटे। हॉलाकि हमें उन सभी से मिलकर इतना अच्छा लग रहा था कि शब्दों में बयां कर पाना बहुत ही मुश्किल है और शायद उन्हें भी उतना ही---! क्यों कि जब से वे लोग फॉसी के बाड़े में आये थे ,तब से जेल प्रशासन और पुलिस वालों के अलावा उन्होंने किसी की सूरत नहीं देखी थी। अब हम सभी 6 माह के लिए उन सभी से बिछुड़ चुके थे।अगले नवरात्रि साधना के दिनों में ही, वो भी केवल नवमी के दिन ही मुलाकात हो सकेगी।
इसके बाद हम बाकी के सभी बाड़ों में गये, आगे से आगे
ख़बर पहुँच रही थी कि गायत्री का प्रसाद लेकर दीदी लोग आ रहे हैं तो सभी लोग अपने तामचीनी के बर्तन हाथ में लिये तैयार लाइन लगाकर बैठे थे।देखते ही खुश होकर गायत्री माता की जय के नारे लगाने लग जाते,बमुश्किल उन्हें शांत करना पड़ता क्यों कि प्रशासन की तरफ़ से यह ग़लत था। इस तरह नवरात्रि की नवमी का दिन हम सबके लिये बहुत ख़ास होता था,घर आते-आते हमें रात हो जाती थी ,लेकिन फिर भी हम सारे बहिन भाई खुश होते थे।

                                               क्रमशः!
                                       'गुरुकॄपा केवलम्'
                                  "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                              👣🙏

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