मेरी ये ज़िद-351


मेरी ये जिद नहीं मेरे गले का हार हो जाओ,
अकेला छोड़ देना तुम जहाँ बेज़ार हो जाओ।

बहुत जल्दी समझ में आने लगते हो ज़माने को,
बहुत आसान हो थोड़े बहुत दुश्वार हो जाओ।

मुलाकातों के वफ़ा होना इस लिए जरूरी है,
कि तुम एक दिन जुदाई के लिए तैयार हो जाओ।

मैं चिलचिलाती धूप के सहरा से आया हूँ,
तुम बस ऐसा करो साया-ए-दीवार हो जाओ।

तुम्हारे पास देने के लिए झूठी तसल्ली हो,
न आये ऐसा दिन तुम इस कदर नादार हो जाओ।

तुम्हें मालूम हो जायेगा कि कैसे रंज सहते हैं,
मेरी इतनी दुआ है कि तुम फनकार हो जाओ।
                                     "अज्ञात"

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