गुरुगीता-49

मैं केवल एक ही जप करता हूँ, 'नाथ केवल एक हैं, एकनाथ सत्य हैं।मैं आपके नाम का ही जप करता रहता हूँ।'
एकनाथ जी के आश्रम में गावबा नाम का उनका भक्त था।भोजन में वह पूरणपूड़ी ही खाता था।रोटी सब्जी, दाल,चावल, दूसरा कुछ उसे अच्छा नहीं लगता था। लोग उसका नाम भूल गए, 'पूरणपूड़ा'कहकर बुलाने लगे।
एक दिन एकनाथ जी महाराज ने गावबा को बुलाया और बोले-बेटे ?आज मैं तुझे मंत्र दीक्षा देता हूँ, तू उस मंत्र का जप करना।
गावबा ने कहा-"गुरुदेव!मैं तो एक जप करता हूँ ।"
"तूने किसी और गुरु से दीक्षा ली है ?"
"मुझे आप पूर्ण गुरु मिल गये हैं, मैं फिर और कहीं से दीक्षा क्यों लूँ ?"
"मैंने तो तुझे दीक्षा दी नहीं!"
"पर मैं तो जप करता हूँ।"
"कौन सा जप करता है तू  ?"
"मैं एक ही जप करता हूँ, 'नाथ केवल एक हैं, एकनाथ सत्य हैं,नाथ केवल-----'मैं आपके नाम का ही जप करता रहता हूँ।"
एकनाथ जी ने देखा कि लोग भले इसे कुछ भी समझते हों, इसकी तो रग-रग में गुरुभक्ति समाई हुई है।एकनाथ महाराज का हृदय उसके प्रति और छलका। एकनाथ जी महाराज जो ग्रंथ लिख रहे थे "भावार्थ रामायण" उसे इसी
सत् शिष्य ने एकनाथ जी के बाद पूरा किया।
सदगुरू के चरणों में विश्वास दिव्य जीवन का द्वार खोल देता है।
गुरुगीता पाठ
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प्रातःशिरसि शुक्लाब्जे द्विनेत्रं द्विभुजं गुरुम् ।
वराभयकरं शान्तं स्मरेत् तन्नामपूर्वकम् ।।53।।
अर्थ
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प्रभात में मस्तक स्थित श्वेत सहस्रदल पद्म में, द्विनेत्र, द्विभुज वर और अभय हस्त, शम गुण युक्त श्री गुरुदेव को उनका नाम उच्चारण पूर्वक स्मरण करें।।53।।
53.
One should meditate and recite the name of the Master early morning as poised in one's head in the white thousands petalled lotus, having two eyes, two arms and hands in the posture of granting boons and fearlessness and completely at peace.
                      👣🙏

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