गुरुगीता-12
जब छत्रपति शिवाजी को यह पता चला कि समर्थ रामदासजी ने महाराष्ट्र के ग्यारह स्थानों में हनुमानजी की प्रतिमा स्थापित की है और वहाँ हनुमान जयंती उत्सव मनाया जाने लगा है, तो उन्हें उनके दर्शन की उत्कृष्ट अभिलाषा हुई। वे उनसे मिलने के लिए चाफल, माजगाँव होते हुए शिगड़वाड़ी आए। वहाँ समर्थ रामदासजी एक बाग में वृक्ष के नीचे "दासबोध" लिखने में मग्न थे।
शिवाजी ने उन्हें दंडवत प्रणाम किया और उनसे अनुग्रह के लिए विनती की। समर्थ ने उन्हें त्रयोदशाक्षरी मंत्र देकर अनुग्रह किया और "आत्मानाम" विषय पर गुरुपदेश दिया (यह "लघुबोध" नाम से प्रसिद्ध है और "दासबोध" में समाविष्ट है।) फिर उन्हें श्रीफल, एक अंजलि मिट्टी, दो अंजलियाँ लीद एवं चार अंजलियाँ भरकर कंकड़ दिए।
जब शिवाजी ने उनके सान्निध्य में रहकर लोगों की सेवा करने की इच्छा व्यक्त की, तो संत बोले- "तुम क्षत्रिय हो, राज्यरक्षण और प्रजापालन तुम्हारा धर्म है। यह रघुपति की इच्छा दिखाई देती है।" और उन्होंने "राजधर्म" एवं "क्षात्रधर्म" पर उपदेश दिया।
शिवाजी जब प्रतापगढ़ वापस आए और उन्होंने जीजामाता को सारी बात बताई, तो उन्होंने पूछा- "श्रीफल, मिट्टी, कंकड़ और लीद का प्रसाद देने का क्या प्रयोजन है?" शिवाजी ने बताया- "श्रीफल मेरे कल्याण का प्रतीक है, मिट्टी देने का उद्देश्य पृथ्वी पर मेरा आधिपत्य होने से है, कंकड़ देकर यह कामना व्यक्त हो गई है कि अनेक दुर्ग अपने कब्जे में कर पाऊँ और लीद अस्तबल का प्रतीक है, अर्थात उनकी इच्छा है कि असंख्य अश्वाधिपति मेरे अधीन रहें।" इस प्रकार राजधर्म को समझकर शिवा ने अपनी शक्ति का विस्तार किया और न्याय नीति की स्थापना की।
गुरुगीता पाठ
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तीर्थराज: प्रयागोsसौ गुरुमूर्त्यै नमो नमः ।
गुरुमूर्ति स्मेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत् ।
गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यं न भावयेत ।।14।।
अन्वयः-
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असौ - वह, तीर्थराज: प्रयागो -तीर्थराज प्रयाग, गुरुमूर्त्यै -
गुरुमूर्ति को, नमोनम: - नमस्कार नमस्कार, नित्यं - नित्य, गुरुमूर्तिम् - गुरुमूर्ति को, स्मरेत् - स्मरण करे, सदा - सदा, गुरुनाम - गुरु नाम, जपेत् - जपे, गुरो: - गुरु का,
आज्ञाम् - आज्ञा, प्रकुर्वीत - पालन करें, गुरोरन्यम् - गुरु के अतिरिक्त किसी को, न भावयेत - चिन्तन न करें ।।14।।
अर्थ
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वे तीर्थराज प्रयाग हैं, गुरुमूर्ति को नमस्कार, नमस्कार, । नित्य गुरुमूर्ति का स्मरण करें, गुरुदेव की आज्ञा का पालन
करें, गुरु के अतिरिक्त किसी अन्य का चिन्तन न करें ।।14।।
"अथवा सर्वपापानां गुरुनाम जपस्मृत:।
साक्षादस्य हि कलुषं परिशुद्धं यथाग्निना।।"
अग्नि द्वारा जिस प्रकार धातुसमूह शोधित होता है, उसी प्रकार गुरुनाम के जप द्वारा प्रत्यक्ष सब पाप नष्ट हो जाते हैं ।।14।।
14.He is the sacred (Prayag) confluence of ,Ganges,Yamuna and invisible Saraswati, repeated obesiance to the physical form of the Master,should always
recite the name of the Master and should carry out his order and should not bother
about anybody accept the Master.
COMMENTS
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Just as fire purifies the metals,similarly the (Japa) recitation of the name of the Master destroys all the sins practically .
👣🙏
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