गुरुगीता-22

भगवान शिव आदि व अनंत हैं अर्थात न तो कोई उनकी उत्पत्ति के बारे में जानता है और न कोई अंत के बारे में। यानी शिव ही परमपिता परमेश्वर हैं। भगवान शिव ने भी गुरु बनकर अपने शिष्यों को परम ज्ञान प्रदान किया है। अगर कहा जाए कि भगवान शिव सृष्टि के प्रथम गुरु हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
भगवान विष्णु के अवतार परशुराम को अस्त्र शिक्षा शिव ने ही दी थी। शिव के द्वारा दिए गए परशु (फरसे) से ही परशुराम ने अनेक बार धरती को क्षत्रिय विहीन कर दिया था। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार नागों की बहन जरत्कारु (मनसा) के गुरु भी भगवान शिव ही हैं।
शिव ने दानवों के गुरु शुक्राचार्य को मृत संजीवनी विद्या सिखाई थी। एक बार देवता व दानवों में भीषण युद्ध हुआ। देवता जितने भी राक्षसों का वध करते, शुक्राचार्य मृत संजीवनी विद्या से उन्हें पुन: जीवित कर देते। यह देख भगवान शिव ने शुक्राचार्य को निगल लिया तथा युद्ध समाप्त के बाद पुन: बाहर निकाल दिया। शिव के द्वारा पुन: उत्पन्न होने से ही माता पार्वती ने शुक्राचार्य को अपना पुत्र माना।
गुरुगीता पाठ
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संसारवृक्षमारूढा: पतन्ति नरकार्णवे।
येनोद् धृतमिदं विश्वं तस्मै श्रीगुरवे नम:।।24।।
अर्थ
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देहाभिमान के कारण जीव संसार में बार-बार यातायात करके नरक में गिरते हैं,जो इस विश्व के निवासी का उद्धार
करते हैं उन श्री गुरुदेव को मैं प्रणाम करता हूँ ।।24।।
24 .
Such a consciousness of the body where the individual ego and pride play an important role,takes birth again and again
and finally attains hell. The one who delivers the habitants of this universe from the cycle of birth & death, I offer my
Salutation to such a Master.
                                    👣🙏

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